काफी समय से भारतीय फ़िल्म वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो रही हैं। अब जैसे की वेनिस फिल्म फेस्टिवल 2020 में ही भारतीय सिनेमा का नाम रौशन हुआ है। अपको बता दें कि फिल्ममेकर चैतन्य तम्हाणे की फ़िल्म ‘द डिसाइपल’ ने वेनिस फिल्म फेस्टिवल में ‘द इंटरनेशनल फ़ेडरेशन ऑफ़ फ़िल्म क्रिटिक्स’अवॉर्ड जीता है। यह अवॉर्ड फ़िल्म को बेस्ट स्क्रीनप्ले कैटेगरी में मिला है।
खास बात यह है कि 19 साल बाद किसी भारतीय फ़िल्म ने इस वैश्विक फ़िल्म फेस्टिवल में बाज़ी मारी है। यह जीत अपने आप में भारतीय सिनेमा के लिए एक बड़ा कदम है।
वेनिस फिल्म फेस्टिवल 2020 में भारतीय फिल्ममेकर को मिली एंट्री
वेनिस फिल्म फेस्टिवल में जीत हासिल करने वाली फ़िल्म मराठी भाषा में बनी है। इस फ़िल्म के लेखक और निर्देशक चैतन्य तम्हाणे हैं। यह फिल्म भारतीय शास्त्रीय संगीतकारों की दुनिया में सफलता के सही मायने को दर्शाती है। यानी भारतीय शास्त्रीय संगीतकारों के लिए असल में क्या सफलता है, इसे दिखाने में फिल्म में बख़ूबी तौर पर काम किया गया है। खास बात है कि एक हफ्ते पहले ही फिल्म को बिएनाले में प्रीमियर में किया गया है। यहां भी इसे काफी सरहाना प्राप्त हुई है। टोरेंटो फ़िल्म फेस्टिवल्स में भी यह फिल्म ऑफिशियली नॉमिनेट हो चुकी है।
19 साल के लंबे समय के बाद वेनिस फ़िल्म फेस्टिवल्स में भारतीय फिल्म ने विजय प्राप्त किया है। इससे पहले वर्ष 2001 में मीरा नायर की फिल्म ‘मॉनसून वेडिंग’ ने इस फिल्म फेस्टिवल में एंट्री मारी थी। इस फिल्म को भी फेस्टिवल का टॉप प्राइज द गोल्डन लॉयन प्राप्त हुआ था। इस दफा दुनियाभर से कुल 18 फिल्मों को एंट्री मिली है। जिसमें भारतीय फ़िल्म का नाम भी शामिल है। बता दें कि 1937 में पहली बार संत तुकाराम को वेनिस फेस्टिवल में जगह मिली थी।
द इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ फिल्म क्रिटिक्स अवॉर्ड के बारे में जानें
द इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ फिल्म क्रिटिक्स अवॉर्ड के बारे में बात की जाए तो यह अवॉर्ड फिल्म संस्कृति को प्रोत्साहित एवं विकसित करने के साथ ही पेशेवर हितों के लिए दिया जाता है। 1930 में इसकी शुरुआत बेल्जियम के ब्रसेल्स में हुई थी। इसके न्यायाधीशों में दुनियाभर के पत्रकार और फिल्म समीक्षक शामिल होते हैं।
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