करोड़ों युवाओं को प्रेरणा देने वाले स्वामी विवेकानंद का जन्म कोलकाता में 12 जनवरी, 1863 में हुआ था। इनके माता पिता का नाम पिता विश्वनाथ दत्त और माता भुवनेश्वरी देवी था। अपको बता दें कि राजस्थान के झुंझुनूं जिले के खेतड़ी के महाराजा अजीत सिंह ने उन्हें ‘विवेकानंद’ नाम दिया और सिर पर स्वाभिमान की केसरिया पगड़ी पहनाकर व जहाज का टिकट करवा कर अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म परिषद में हिन्दू धर्म व भारतीय संस्कृति का शंखनाद करने के लिए भेजा था।
हालांकि, विश्व धर्म परिषद में इन्हें पर्याप्त समय नहीं मिल सका था। लेकिन किसी प्रोफ़ेसर की पहचान से थोड़े समय के लिए इन्हें शून्य पर अपने विचार को रखने के लिए कहा गया था। इस भाषण की शुरुआत जब उन्होंने ‘अमेरिकी भाइयों और बहनों’ से की तो पूरा सदन तालियों की आवाज़ से गूंज उठा। इनके भाषण से सभी विद्वान चकित रह गए और अमेरिकी मीडिया ने इन्हें ‘साइक्लॉनिक हिन्दू’ का नाम दिया।
इस तरह शिकागो पहुंचे थे स्वामी विवेकानंद
25 साल की आयु में स्वामी विवेकानंद ने गेरुआ वस्त्र धारण कर लिया था। इसके बाद उन्होंने पैदल ही पूरे भारत की यात्रा की। फिर 31 मई 1893 को मुंबई से अपनी विदेश यात्रा शुरू की। मुंबई से वह जापान पहुंचे। जापान में नागासाकी, कोबे, योकोहामा, ओसाका, क्योटो और टोक्यो का उन्होंने दौरा किया। इसके बाद वह चीन और कनाडा होते हुए अमेरिका के शिकागो शहर में पहुंचे थे।
शिकागो में दिए गए इस महान भाषण की झलक
मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों!
आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया है उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा है। संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परंपरा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूं। धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूं और सभी संप्रदायों एवं मतों के कोटि-कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूं।
मैं इस मंच पर से बोलने वाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूं जिन्होंने आपको यह बतलाया है कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रचारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं। मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूं जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृत दोनों की ही शिक्षा दी है। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते, वरन समस्त धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार करते हैं।
मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीडि़तों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता है कि हमने अपने वक्ष में उन यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी जिस वर्ष उनका पवित्र मंदिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था। ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व का अनुभव करता हूं जिसने महान जरथुष्ट्र जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा है।
भाइयों, मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियां सुनाता हूं जिसकी आवृत्ति मैं बचपन से कर रहा हूं और जिसकी आवृत्ति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं।
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