धर्म परिवर्तन हमारे देश में हमेशा से ही विवाद का विषय रहा है। कई लोग इस संबंध में न्यायालय से सरल नियम बनाने की अपील करते रहे हैं। ऐसे में एक याचिकाकर्ता ने राजस्थान हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ याचिका दायर की है जिसमें उसने धर्म परिवर्तन को लेकर कड़े निर्देश दिए थे। राजस्थान हाई कोर्ट का कहना था कि धर्म परिवर्तन करने से पहले यह जांच की जानी चाहिए कि धर्म परिवर्तन शादी के उद्देश्य किया जा रहा है या फिर धर्म में आस्था रखने के उद्देश्य से। याचिकाकर्ता ने अपना नाम गुप्त रखा है। राजस्थान हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि धर्म परिवर्तन करने से पहले जिला कलेक्टर को 1 हफ्ते पहले सूचना देनी होगी और जिला कलेक्टर एक हफ्ते पहले इस पर सार्वजनिक सूचना जारी करेगा।
जिला कलेक्टर को सूचना देने के एक हफ्ते बाद ही कोई धर्म का परिवर्तन कर सकता है। राजस्थान हाई कोर्ट ने यह आदेश इसलिए जारी किए थे क्योंकि लोग शादियों को लेकर जबरन धर्म का परिवर्तन करा लिया करते हैं। शादी को लेकर जबरन धर्म परिवर्तन पर नियंत्रण करने के लिए राजस्थान हाई कोर्ट ने यह आदेश 15 दिसंबर 2017 को जारी किए थे। जिस पर एक याचिका कर्ता ने याचिका दायर की थी।
याचिकाकर्ता का कहना है कि राजस्थान हाई कोर्ट का यह आदेश संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और यह आदेश सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्यीय पीठ द्वारा दिए गए निजता के अधिकार का भी उल्लंघन करता है। वकील जोजोसेफ एरिस्टोटल के माध्यम से दायर इस याचिका में कहा गया है कि कोर्ट किसी व्यक्ति की मानसिक स्थिति को परखने की जिम्मेदारी जिला अथॉरिटी को देता है जो कि बहुत ही गैर जिम्मेदाराना और अनुचित है। ऐसा नहीं किया जाना चाहिए।
दरअसल इस देश में धर्म परिवर्तन हमेशा ही विवाद का विषय रहा है। लोग कभी अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन कर आते हैं तो कभी शादी के लिए मजबूर होकर। अब देखना यह है कि धर्म का परिवर्तन जैसे संबंधित विषय पर सुप्रीम कोर्ट क्या कहता है।

