बेहतरीन राजनेता के साथ मशहूर कवि अटल बिहारी की सलामती के लिए दुआएं

 

हितेश पंत (नई दिल्ली)

देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को इलाज के लिए दिल्ली एम्स में भर्ती कराया गया है। अटल बिहारी लंबे समय से बीमार चल रहे हैं और उन्हें रूटीन चैकअप के लिए एम्स में लाया गया है। देश में कई जगह लोग हवन कर उनके जल्द स्वस्थ होने की दुआ मांग रहे हैं। अटल बिहारी को लोग सिर्फ एक राजनेता के तौर पर ही पसंद नहीं करते बल्कि एक साहित्यकार, कवि और बेहतरीन वक्ता के तौर पर भी उन्होंने लोगों के दिलों में जगह बनाई है।

 

एक स्वतंत्रता सेनानी से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक का सफर तय करने वाले अटल बिहारी की प्रसंशा विपक्षी भी खूब करते हैं। प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने विदेशों में भारत की साख को ऊंचाई पर पहुंचाया। साल 1998 में पोखरण में परमाणु परीक्षण करवाकर उन्होंने दुनिया में ये साबित किया कि भारत किसी भी देश के दबाव में आने वाला नहीं है।

 

देशहित के लिए कड़े कदम उठाने के लिए अटल बिहारी को आज भी अब तक के बेहतरीन प्रधानमंत्री में से एक मानते हैं। इसके अलावा एक साहित्यकार और कवि के रूप में उनकी ख्याति देश-विदेश में पहुंची। चाहे कोई रैली हो या संसद में उनका वक्तव्य, हर जगह उनकी कविता के अंश जरूर मिलते रहे। उनकी कुछ कविताएं आज भी लोगों की जुबान पर रहती हैं। हम यहां उनकी ऐसी ही कुछ कविताएं दे रहे हैं।

 

एक बरस बीत गया

झुलासाता जेठ मास

शरद चांदनी उदास

सिसकी भरते सावन का

अंतर्घट रीत गया

एक बरस बीत गया

सीकचों मे सिमटा जग

किंतु विकल प्राण विहग

धरती से अम्बर तक

गूंज मुक्ति गीत गया

एक बरस बीत गया

पथ निहारते नयन

गिनते दिन पल छिन

लौट कभी आएगा

मन का जो मीत गया

एक बरस बीत गया

 

दो अनुभूतियाँ

पहली अनुभूति:

गीत नहीं गाता हूँ

बेनक़ाब चेहरे हैं,

दाग़ बड़े गहरे हैं

टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूँ

गीत नहीं गाता हूँ

लगी कुछ ऐसी नज़र

बिखरा शीशे सा शहर

अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूँ

गीत नहीं गाता हूँ

पीठ मे छुरी सा चांद

राहू गया रेखा फांद

मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूँ

गीत नहीं गाता हूँ

 

दूसरी अनुभूति:

गीत नया गाता हूँ

टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर

पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर

झरे सब पीले पात

कोयल की कुहुक रात

प्राची मे अरुणिम की रेख देख पता हूँ

गीत नया गाता हूँ

टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी

अन्तर की चीर व्यथा पलको पर ठिठकी

हार नहीं मानूँगा,

रार नहीं ठानूँगा,

काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ

गीत नया गाता हूँ

 

हिरोशिमा की पीड़ा

किसी रात को

मेरी नींद चानक उचट जाती है

आँख खुल जाती है

मैं सोचने लगता हूँ कि

जिन वैज्ञानिकों ने अणु अस्त्रों का

आविष्कार किया था

वे हिरोशिमा-नागासाकी के भीषण

नरसंहार के समाचार सुनकर

रात को कैसे सोए होंगे?

क्या उन्हें एक क्षण के लिए सही

ये अनुभूति नहीं हुई कि

उनके हाथों जो कुछ हुआ

अच्छा नहीं हुआ!

यदि हुई, तो वक़्त उन्हें कटघरे में खड़ा नहीं करेगा

किन्तु यदि नहीं हुई तो इतिहास उन्हें

कभी माफ़ नहीं करेगा!

 

जीवन की ढलने लगी साँझ

जीवन की ढलने लगी सांझ

उमर घट गई

डगर कट गई

जीवन की ढलने लगी सांझ।

 

बदले हैं अर्थ

शब्द हुए व्यर्थ

शान्ति बिना खुशियाँ हैं बांझ।

 

सपनों में मीत

बिखरा संगीत

ठिठक रहे पांव और झिझक रही झांझ।

जीवन की ढलने लगी सांझ।

 

साभार- कविता कोश

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