कोलकाता में पयर्टकों को आकर्षित करने वाला ऐतिहासिक ट्राम अपने आप में अलग ही मिसाल है। आम लोगों के लिए इसका सफर राहत भरा होता है। लेकिन जिस रफ़्तार से इसके रूट बंद हो रहे हैं उस लिहाज़ से प्रदूषणविहीन यातायात के साधन के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल छाने की उम्मीद है।
जानिए इसके बारे में
ट्राम यानी ट्रॉली कार एक ऐसा रेल वाहन है जो आमतौर पर शहर की सड़कों के साथ-साथ, बिछाई गयी पटरियों पर दौड़ती है। 19वीं सदी का ट्रांसपोर्ट आज 21 वीं सदी का आधुनिक वाहन है। इसका मुख्य उर्जा स्रोत बिजली है लेकिन कुछ क्षेत्रों में इन्हें डीज़ल से भी चलाया जाता है।
विद्युतीकरण से पूर्व शहरी इलाकों में ट्रामों को घोड़ों या खच्चरों की मदद से खींचा जाता था या फिर भाप अथवा पेट्रोल के इंजनों द्वारा इन्हें उर्जा प्रदान की जाती थी। भारत में ट्रामें सिर्फ कोलकता में चलाई जाती हैं जिसका संचालन कैल्कटा ट्रामवेज़ कंपनी द्वारा किया जाता है।
भविष्य बना चिंता का विषय
2011 में ऐतिहासिक ट्राम के ३७ रूट थे जो कि अब कम होते हो कर 8 हो गए हैं। उस दौरान महानगर में ट्राम का ट्रेक 61 किलोमीटर लम्बा था वह अब कम होकर 14 किलोमीटर रह गई है।
महानगर में प्रदूषण कम करने हेतु बिजली चालित बसें चलाए जाने का निर्णय लिया गया है। नोनापुकुर ट्राम डिपो और गरियाहाट ट्राम डिपो में इन बसों का चार्जिंग प्वाइंट बनाया जाएगा। बेलगछिया से चार रूट पर चलने वाली ट्राम बंद कर दी गई हैं क्योंकि ब्रिज के ऊपर से ट्राम लाइन हटा दी जा रही है इसलिए यह सारी रुट ही बंद कर दी गई है। राजाबाजार डिपो से ६ रूट के लिए ट्रामें चलती थीं, अब रूटों की संख्या 3 हो गई है। ईस्ट-वेस्ट मेट्रो के काम के वजह से एस्प्लानेड रूट की ट्राम सेवा प्रभावित हुई है।
ख़तरे में आया ट्राम रूट
ट्राम की आवाजाही कम होने, रूट बंद होने के कारण ट्राम कम्पनी के कर्मचारियों के पास काम नहीं है। एक कर्मचारी के अनुसार ट्राम के चक्के में स्पात लगाना पड़ता है। जिसकी मियाद 5-6 महीने है। गत तीन सालों से इसमें किसी प्रकार का बदलाव नहीं किया गया है।
अच्छी ख़बर
परिवहन मंत्री के अनुसार ट्राम का भविष्य चिंता का विषय नहीं है। ट्राम को किसी तरह से भी बंद नहीं किया जा रहा। ट्राम डिपो में बहुत जगह होने के कारण विद्युत चालित बसों के लिए उसका इस्तेमाल किया जा रहा है।
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