पुस्तक का नाम: हौसलानामा
लेखक : ओम प्रकाश सिंह (IPS)
प्रकाशक: Wisdom Tree
मूल्य: 195 रूपये
उपलब्ध: https://amzn.to/32OQ3d1
समीक्षा: राजेश्वर सिंह
कहते हैं जीवन में कुछ बड़ा करना है तो संसाधनों से पहले अगर कुछ चाहिये तो वो है ‘हौसला’. अगर आपके पास संसाधन है और हौसला नहीं तो संसाधन व्यर्थ हैं. जब प्रश्न उठता है कि हौसला आता कहा से है तो हौसला आता है ‘ हौसलानामा’ जैसी किताबों से, जो सिर्फ किताब नहीं है, बल्कि अपने आप में जीवन है. अगर हर व्यक्ति अपने जीवन को अनुभवों से सीखने में ही लगा दे तो उसका सारा जीवन सीखकर कुछ करने के बजाय सीखने में ही खप जाएगा. इसलिए जरूरी है कि दूसरों के जीवन से सीखा जाए, ‘हौसलानामा’ जैसी किताबों को पढ़कर.
ओमप्रकाश सिंह हरियाणा कैडर के आईपीएस हैं इन्होने एक पुस्तक लिखी है ‘ हौसलानामा’ जिसमे अपने जीवन के हर उस अनुभव को बयां किया है जिससे लगभग हर व्यक्ति को जीवन में दो चार होना पड़ता है इस किताब से सीखने को मिलता है कि जीवन के कठिन दौर को भी सामान्य रह कर कैसे जिया जा सकता है गंभीर मामले को भी कैसे सामान्य और रोचक तरीके से लिखा जा सकता है कैसे समाज और सिस्टम को समझा जा सकता है कैसे बड़े बनकर भी सहज रहा जा सकता है गांव से लेकर शहर तक अमीर से लेकर गरीब तक देश से लेकर विदेश तक जीवन की हर घटना को बड़े ही रोचक अन्दाज में बयां किया गया है।
‘हौसलानामा’ में गांव की खूबसूरती को बड़े निराले अंदाज में बयां किया गया है. गांव के हर हिस्से को बड़ी बारीकी से बताते हुए लिखते हैं ‘‘जो भी हो, गांव बचपन बिताने के लिए एक शानदार जगह थी. कोई लाग-लपेट, कोई ढकोसला नहीं था.‘ सवारी अपने सामान की स्वयं ही जिम्मेदार है, इसकी ‘हेन्ड्स ऑन’ ट्रेनिंग होती थी. जीवन अनिश्चितताओं का खेल है, यह कदम कदम पर साबित होता था .‘हम किसी से कम नहीं‘ की रील कभी उतरती ही नहीं थी. बड़ी बात यह थी की यह लड़ने लड़ाने का पूरा प्रशिक्षण, प्रोत्साहन और अवसर देती थी.
‘ जीवन एक अंतरिक्ष यात्रा‘ में लेखक ने जीवन को एक यात्रा बताया है. इस हिस्से में लेखक ने जीवनकाल के दौरान जहन में उठने वाले प्रश्नो का उत्तर खुद ही खोजने सलाह दी है क्योंकि दूसरे से अपने प्रश्नों का जवाब पूछने पर विश्वास और तर्क जैसी चीज़ों का सामना करना पड़ सकता है. देर सवेर सबके मन में यही सवाल उठता है कि हम कहाँ से आये हैं, यहाँ क्या करना है और जाएंगे कहाँ? इस विषय पर ज्ञान बाँटने वाले बहुत बड़ी संख्या में हमारे आस पास ही मौजूद हैं. इसलिए जरूर है कि आजकल के दिखने वाले ज्ञानियों से बचा जाए और अपने दिमाग से काम किया जाये. जो भी मांगना है भगवान से मांगिये, जो भी दुःख और सुख व्यक्त करना है तो भगवान से ही करिये क्योंकि ये दुनिया समस्याओं का हल कम बताती है, मज़े ज्यादा ले जाती है.
‘आज़ादी की लड़ाई‘ में लेखक ने अपने बचपन में अपनी आजादी के लिए किये जाने वाले संघर्ष को बड़ी खूबसूरती के साथ 1971 के दौरान हुए भारत पाकिस्तान के युद्ध के उपरांत बांग्ला देश की आजादी से जोड़कर बताया है. जिसमें लेखक के बचपन की कहानी है कि कैसे लेखक की हरकतों से तंग आकर माँ ने उसका दाखिला 3 साल की उम्र में ही स्कूल में करा दिया. उसके बाद लेखक की कुशाग्रता के बारे में चर्चा की गयी है. लेखक प्राइमरी स्कूलों पर टिप्पणी करते हुए कहता है कि स्कूल दिमाग खोलने की जगह होनी चाहिए, रटने रटाने का अड्डा नहीं.
‘लड़की की शादी‘ में लेखक ने बड़े ही हलके अंदाज में उस समय पर होने वाली सौदेबाजी की व्यवस्था पर बहुत गहरी टिप्पणी की है, जो आज के समय में भी बहुत प्रासंगिक है.लेखक बताता है हमारे गांव में लड़की का बाप होना मतलब फ़ौज में कोर्ट मार्शल होने जैसा है. लड़की की पढाई लिखे से ज्यादा उसकी शादी की चिंता की जाती है. माँ उसे चौका चूल्हे के काम में लगाए रखने में ही भलाई समझती है. इसके अलावा लेखक ने दहेज़ लोभियों पर भी कटाक्ष करते हुए लिखा है कि जिसका लड़का सरकारी नौकरी में लग जाता, उसके बाप की भौंहे तन जाती, बहुत ही घमंड के साथ लड़की के बाप से बात करता, चाहे उसका लड़का चपरासी ही क्यों न बना हो. इधर लड़की पक्ष को भी लेखक ने नहीं बख्शा, उनके बारे में लिखा है कि बहुत से लड़की वाले किसी बड़ी पार्टी को फंसाने के लिए अपनी हैसियत और लड़की के गुणों का बढ़ा चढ़ा कर बखान करते, सौदा न बनता तो मोटी रकम का ऑफर देकर निकल लेते थे.
‘बेचारी हिंदी‘ में लेखक ने हिंदी का दुर्दशा का भी वर्णन किया है. लेखक ने बताया है कि कैसे उन्होंने स्कूल के समय पर अंग्रेजी और संस्कृत को झेला था. हिंदी को बेचारी समझा जाता था. जो सरपट अंग्रेजी बोल लेता उसे परम ज्ञानी होंने का प्रमाण दे दिया जाता था. लेखक ने ‘हौसलानामा’ में लिखा है‘ एक सर्वे वाले ने लिखा कि दुनिया में सौ में चालीस को एक, तेतालीस को दो, तरह को तीन और तीन को चार भाषा धड़ल्ले से बोलनी आती हैं. सौ में से सिर्फ एक आदमी ही पांच से अधिक भाषा बोल सकता है. अपनी गिनती तो पांच-छह तक पहुँच चुकी थी. सिविल सर्विस परीक्षा में पास का औसत तीन सौ में एक का था.
लेखक ने इमरजेंसी के समय का वर्णन भी बहुत ही रोचक अंदाज में किया है. उस समय की कठिनाइयों को भी लेखक ने बहुत सहजता से वर्णित किया है. लेखक ने इस हिस्से को ‘ मरजेंसी‘ नाम दिया है. लेखक ने बताया कि जब देश में अंग्रेजों का शासन था, तो पूरे देश में एक असंतोष का भाव था. उस समय के भारतीय नेताओं ने देश की जनता को बहुत ख्वाब दिखाए. इन ख्वाबों को देखकर पूरे देश में आजादी का आंदोलन हुआ. जब आजादी मिली तो देश की कमान भारतीय नेताओं को मिली. काम हो रहा था मगर व्यवस्था नहीं बन पा रही थी. लोग इतनी अधिक उम्मीद पाल चुके थे कि विकास की उस गति से संतुष्ट नहीं हो पा रहे थे. उसके बाद सरकार के खिलाफ भी एक नया खेमा तैयार हो गया. जिसने उस सरकार के खिलाफ ही आंदोलन कर दिया. मौका देखते हुए सरकार द्वारा देश में इमरजेंसी लगा दी गयी, जिसे आमलोग ‘मरजेंसी’ के नाम से जानते थे. उस समय ‘परिवार नियोजन’ की स्कीम में कुंवारे भी शामिल हो गए. कुछ समय बाद जब इमरजेंसी हटी तो उसको होर्डिंग लगाकर ‘उपलब्धियों‘ के रूप में प्रचारित किया गया.
इस प्रकार ये ‘हौसलानामा‘ जीवन के उन पहलुओं से अवगत कराती है, जिन्हे आप बिना जिए जानना चाहते हैं. किताब को पढ़ते वक्त आपकी आँखों में फिल्म की रील चलती है. सब कुछ आपको अपने जीवन में ही घटित होता हुआ दिखता है. कई किरदारों में आप खुद को खड़ा पाते हो. इसलिए कहा जा सकता है कि यह एक किताब नहीं, एक जीवन है, जिसे आप दूर से खड़े होकर देख रहे हैं और उससे सीख रहे हैं.
‘हौसलानामा’ किताब लेखक ने अपने माता पिता को समर्पित करते हुए लिखी है. यह किताब हमे ऐसे मुश्किल समय में एक आसान रास्ता दिखती है, जब हम कहीं कोई रास्ता नजर नहीं आता. यह किताब अब तक चले आ रही लेखन की उस परम्परागत कड़ी को तोड़ती है, जिसमें उस घटना के हिसाब से ही भाव उत्पन्न करने की कोशिश की जाती है क्योंकि इस किताब में लेखक ने जीवन के बहुत मुश्किल हिस्सों को भी बहुत आसान शब्दों में जाहिर किया है, जिससे सीखने को मिलता है कि मुश्किल वक्त में भी कैसे सामान्य रहकर आगे बढ़ा जा सकता है. समय निकाल कर इस किताब को जरूर पढ़िए, यकीन मानिये समय व्यर्थ नहीं जाएगा.
