जानिए भारत की अदालतों में गवाह को शपथ क्यों दिलाई जाती है

भारत की अदालतों में

भारत में मुगलों और अन्य शासकों के शासन के दौरान धार्मिक किताबों पर हाथ रखकर कसम खाने की प्रथा थी। हालाकि, इस समय तक यह एक दरबारी प्रथा थी इसके लिए कोई कानून नहीं था लेकिन अंग्रेजों ने इसे कानूनी जामा पहना दिया और इंडियन ओथ्स एक्ट, 1873 पास किया और सभी अदालतों में लागू कर दिया गया था। तभी से भारत की अदालतों में गवाह को कुछ भी कहने से पहले कसम खानी होती थी।

भारत की अदालतों में

क्या आपको पता है ये बड़ी बात

अदालत में कसम खाने की यह प्रथा स्वतंत्र भारत में 1957 तक कुछ शाही युग की अदालतों, जैसे बॉम्बे हाईकोर्ट में नॉन हिन्दू और नॉन मुस्लिम्स के लिए उनकी पवित्र किताब पर हाथ रखकर कसम खाने की प्रथा जारी थी।

इस प्रथा पर कब लगा पूर्ण विराम

भारत की अदालतों में किताब पर हाथ रखकर कसम खाने की प्रथा 1969 में समाप्त हुई। जब लॉ कमीशन ने अपनी 28वीं रिपोर्ट सौंपी तो देश में भारतीय ओथ अधिनियम, 1873 में सुधार का सुझाव दिया गया और इसके स्थान पर ‘ओथ्स एक्ट, 1969’ पास किया गया था। इस तरह से पूरे देश में एक समान शपथ कानून लागू कर दिया गया है।

अब कैसे गवाहों पर किया जाता है विश्वास

इस कानून के पास होने से भारत की अदालतों में शपथ लेने की प्रथा के स्वरुप में तब्दीली लाई गई और अब शपथ एक सिर्फ  सर्वशक्तिमान भगवान के नाम पर दिलाई जाती है। यानी अब शपथ को सेक्युलर बना दिया गया है। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, पारसी और इसाई के लिए अब अलग-अलग किताबों और शपथों को बंद कर दिया गया है।

गवाह को कसम खिलाई जाने की वजह क्या है

अगर कोई इंसान कसम खाने के बाद भी झूठ बोलता है तो इंडियन पैनल कोड के सेक्शन 193 के तहत यह कानून अपराध है और झूठ बोलने वाले को 7 साल की सजा दी जाती है। और तो और इस सेक्शन में यह प्रावधान है कि, जो कोई भी गवाह किसी न्यायिक कार्यवाही के किसी मामले में झूठा प्रमाण या साक्ष्य देगा य किसी न्यायिक कार्यवाही के किसी प्रक्रम में उपयोग किये जाने हेतू झूठा साक्ष्य बनाएगा तो उसे 7 वर्ष के कारावास और जुर्माने से भी दण्डित किया जायेगा।

हालाकि प्राचीन काल में लोग अधिक धार्मिक होते थे और धार्मिक मूल्यों के बहुत अधिक महत्व देते थे इसलिए राजाओं और अंग्रेजों ने भारतीयों की धार्मिक आस्था का उपयोग लोगों से सच उगलवाने में किया जिससे की समाज में अपराध कम हों और अपराधी को पकड़कर दंड दिया जा सके।

लेकिन अब भारत की अदालतों में गीता या कुरान जैसी ना तो कोई पवित्र पुस्तक मौजूद हैं और ना ही किसी किताब पर हाथ रखकर कसम खिलायी जाती है बल्कि अदालतों के अंदर, भारतीय संविधान ही एकमात्र पवित्र पुस्तक है।

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Saddiya Anwar

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