सोशल मीडिया में अपनी पोस्ट से आजकल एक बच्चा लाखों दिलों में राज कर रहा है। जिस उम्र में बच्चों का मन खलने-कूदने या घूमने में ज्यादा लगता है, उस उम्र में ये बच्चा दूसरी की मदद में लगा है। यहां हम आपको इस नन्हें समाजसेवक की पोस्ट के बारे में बताएंगे तो आप उसकी तारीफों के पुल बांधे बिना नहीं रह पाएंगे।
जिस उम्र में बच्चे खिलौने जमा करते हैं, उस उम्र में अगर कोई दूसरों की मदद को चंदा जमा करे तो वो बच्चा खास तो होगा। छोटी सी उम्र में कैसे इस बच्चे को दूसरों की जिंदगी बचाने की प्रेरणा मिली ये सब उसने अपनी इस सोशल मीडिया पोस्ट में बताया। वो लिखता है-
“मैं पिछले साल अमेरिका से मुंबई आया. दीवाली में मेरी मां मुझे अपने साथ कैंसर अस्पताल ले गईं. इस अनुभव ने जीवन का मेरा दृष्टिकोण बदल दिया। मैंने जो कुछ महसूस किया वह अपराध जैसा था। मैंने अपने जीवन में कितनी सारी छोटी-छोटी चीजों को लेकर शिकायत की, लेकिन दुनिया में ऐसे लोग भी थे जिनके पास कुछ नहीं था। उन्हें ये भी नही पता था कि वे आने वाला एक और दिन भी नहीं देख पाएंगे या नहीं, लेकिन वे संतुष्ट थे और खुश भी। मैंने नियमित रूप से अस्पताल का दौरा करना शुरू कर दिया और आदित्य नाम के एक छोटे से लड़के ने मुझे जीवन का नया उद्देश्य दिया। आदित्य बहुत बड़ा क्रिकेट प्रशंसक था। मैं उस लड़के के संघर्ष के बारे में अधिक जानना चाहता था, जो मेरी ही तरह कम उम्र का होते हुए भी बहुत कठिन दौर से गुज़र हा था। मेरी मां और मैंने, उसकी मां से बात की।
कीमोथेरेपी के बाद, जब आदित्य भावनात्मक रुप से टूटा हुआ महसूस करता, तो सिर्फ क्रिकेट ही एक ऐसी चीज थी जो उसमें ऊर्जा पैदा करती थी। चाहे वह कितना भी थका हो लेकिन उसे पता चले कि कोई क्रिकेट मैच चल रहा है तो वह शहर जाता और पूरे दिन नाई की दुकान के बाहर खड़े होकर मैच देखता था। जब आईपीएल खत्म होने जा रहा था, तब हमने महसूस किया कि यही वो समय है जब आदित्य का सपना सच हो सकता है। हमने दो वीआईपी टिकटों की व्यवस्था की। मैच के दिन उसे सरप्राइज दिया। उसके चेहरे पर आए रोमांच मैं कभी नहीं भूल सकता। वह पूरे मैच में अपने पैरों पर ही था। ताली बजाना, चीयर करना और पूरी तरह से दीवाना हो जाना, यह उसके लिए केवल मैच नहीं एक यादगार अनुभव था। उसने कहा, उसने कभी अपने जीवन में इतना खाना नहीं देखा और खाया था. यह बयान मेरे लिए वाकई आंखें खोलने वाला था। तब से, मैं नर्गिस दत्त फाउंडेशन के माध्यम से कैंसर पीड़ित वंचित बच्चों के लिए पैसे जुटाने में लगा हूं. पिछले साढ़े तीन महीनों में, मैंने सात लाख 80 हजार रुपए जुटाए हैं, लेकिन यह उन बच्चों की मदद के लिए सागर में सिर्फ एक बूंद के समान है.
मैं अपने उम्र के बच्चों को संदेश देना चाहूंगा कि, हम महीने में चार महंगे गेम खरीदते हैं, यह गलत नहीं पर अगर हम इन गेम्स में कम पैसे खर्च कर किसी जरूरतमंद की मदद में लगाएंगे तो इन पैसों से उसकी जिंदगी संवर सकती है। हम भाग्यशाली हैं कि हमारे पास सारी सुख सुविधाएं हैं, लेकिन उन बच्चों का क्या जिनके मां-बाप उन्हें बेहतर शिक्षा और इलाज नहीं दे सकते। इन बच्चों को भी सामान्य जीवन जीने का अधिकार है। बस एक मिनट के लिए ऐसे बच्चों के बारे में सोचें और उनके लिए दान करें। शायद इस दिसंबर हम ऐसे बच्चों के लिए संता क्लॉज बनकर आएं।”
