हितेश पंत (नई दिल्ली)
देशभर के मंदिर आज महादेव शिव के रंग में रंगे हैं। महाशिवरात्रि को लेकर शिवभक्तों का उत्साह वाकई देखने लायक होता है। मन्यात के अनुसार आज ही के दिन भगवान शिव-पार्वती की शादी हुई थी। उस समय का ये बेहद भव्य विवाह समारोह था, जिसमें देव, दानव, भूत-प्रेत, जानवर, कीड़े मकौड़े सभी शामिल हुए थे। मान्यता है कि ये विवाह हिमालयी क्षेत्र में स्थित त्रियुगीनारायण में हुआ था। आज आपको इसी जगह के बारे में बताएंगे।

महाशिवरात्रि भगवान शिव-पार्वती के विवाह की वर्षगांठ के रूप में मनाई जाती है। इस विवाह को लेकर कई तरह की मान्यताएं हैं। माना जाता है कि भगवान शिव ने उत्तराखंड (वर्तमान में) के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित त्रियुगीनारायण को अपने विवाह के लिए चुना था। पुराणों में उल्लेख है कि मां पार्वती पर्वतराज हिमावत की बेटी थीं। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए माता ने त्रियुगीनारायण से कुछ दूरी पर स्थित गौरी कुंड में तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या से खुश होकर भगवान शिव ने मां पार्वती की इच्छा पूरी करते हुए उनसे विवाह किया।
केदारनाथ मंदिर के रास्ते में पढ़ने वाले गुप्तकाशी के पास त्रियुगीनारायण गांव है। यहां मंदाकिनी और सोन गंगा नदी का मिलन होता है। ऐसी मान्यता है भगवान शिव के प्रस्ताव के बाद इसी जगह पर उनका विवाह हुआ था। पुराणों के अनुसार इस विवाह में भगवान विष्णु ने माता पार्वती के भाई बने थे और ब्रम्हा जी ने पुरोहित की भूमिका निभायी थी। कहते हैं कि जिस हवन कुंड में विवाह की रस्में हुई थीं उस कुंड की ज्योति हमेशा जलती रहती है। केदारनाथ जाने वाले यात्री इस मंदिर में जरूर जाते हैं और पवित्र कुंड के दर्शन करते हैं। हर साल बावन द्वादशी के दिन यहां मेले का भी आयोजन होता है।

भगवान शिव-पार्वती का विवाह इतना खास था कि उसमें सारे जीव शामिल हुए थे। देवताओं के साथ भूत प्रेत, असुर, जानवर सब शिव बारात का हिस्सा बने थे। पुराणों में ये भी बताया गया है विवाह की रस्मों की बीच जब भगवान शिव के परिवार और गौत्र आदि के बारे में पूछा गया तो सबकी खामोशी के बीच नारद मुनि ने बताया भगवान शिव स्वयंभू हैं। उन्होंने स्वयं की रचना की है।