हितेश पंत (नई दिल्ली)
उच्च शिक्षा के मामले में अपने देश की स्थित कुछ अच्छी नहीं है। एक ताजा रिपोर्ट तो कुछ यही संकेत दे रही है। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के टॉप 200 विश्वविद्यालयों में भारत के सिर्फ दो शिक्षण संस्थान ही शामिल हो पाए हैं। रिपोर्ट में ये बात भी सामने आयी है कि देश के अधिकतर मेधावी छात्र उच्च शिक्षा के लिए विदेशों का रुख करते हैं।
प्रमुख उद्योग संगठन एसोचैम और यस इंस्टीट्यूट के अध्ययन के बाद आयी रिपोर्ट भारत में शिक्षा की स्थिति को लेकर कुछ चिंतित तो जरूर करती है। अध्ययन के अनुसार दुनिया के टॉप 200 शिक्षण संस्थानों में भारत के मात्र दो संस्थान दिल्ली विश्वविद्यालय और आईआईटी दिल्ली को शामिल किया गया है।
टॉप संस्थानों की लिस्ट में अमेरिका के 49 शिक्षण संस्थान, ब्रिटेन के 30, जर्मनी के 11, चीन के 8 और ऑस्ट्रेलिया के 8 संस्थानों को शामिल किया गया है। ऐसे में भारत के दो संस्थानों को ही लिस्ट में जगह मिल पाना चिंताजनक और शर्मनाक है। शिक्षा के बेहतरी के लिए भारत को इन देशों से काफी कुछ सीखने की जरूरत है।
रिपोर्ट में ये बात भी कही गई है कि भारत के अधिकतर मेधावी छात्र उच्च शिक्षा या शोध कार्यों के लिए विकसित देशों के विश्वविद्यालयों को प्रथामिकता देते हैं। इससे उन देशों को अच्छी प्रतिभाएं मिलती हैं और वहां के कॉलेजों का नाम ऊंचा होता है। अध्ययन के मुताबिक वर्तमान में करीब 6 लाख भारतीय छात्र विदेशी शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई कर रहे हैं। ये छात्र विदेशों में अपनी पढ़ाई पर करीब 20 अरब डॉलर सालाना खर्च करते हैं।
देश की ताजा स्थिति पर नजर डालें तो इंजीनियरिंग के टॉप संस्थानों में शुमार आईआईटी और एनआईटी में इस साल कई सीटें खाली रह गईं। इससे भी ये स्पष्ट होता है कि भारतीय छात्र बेहतर पढ़ाई, शोध और फिर बेहतर जॉब के लिए विदेशी कॉलेजों का रुख कर रहे हैं। ऐसे में भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों को ये विचार करने की जरूरत है कि कैसे देश में उच्च शिक्षा का स्तर उठाया जाए।