5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाता है । हमने प्रकृति का दोहन जिस सम्वेदन हीनता से किया है, उसका परिणाम लगातार बढ़ते तापमान, घटते पानी के स्तर और कई तरह की बीमारियों के रूप में हमारे सामने है।
1972 में5 जून से 16 जून तक संयुक्त राष्ट्र संघ की बैठक हुई थी । जिसमें इस विषय पर गंभीर चर्चा हुई। “संयुक्त राष्ट्र संघ पर्यावरण कार्यक्रम” (UNEP) के अन्तर्गत इस दिशा में काम हो रहे हैं।
1974 से विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में 5 जून को जाना जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ की इस वर्ष की बैठक में लगभग 100 देशों ने भाग लिया था। आज पर्यावरण संरक्षण के इस मुहिम में 100 से अधिक देश शामिल हैं।
इस वर्ष पर्यावरण दिवस की मेजबानी चीन कर रहा है। “वायु प्रदूषण” इस वर्ष का टाइटिल है।
भारत में यदि वायु प्रदूषण की स्थिति देखें तो भारत फ्यूलवुड का सर्वाधिक इस्तेमाल करने वाला देश है। ज़हरीली कार्बन मोनो ऑक्साइड के लगातार सम्पर्क में रहने के कारण अब तक 300,000 से 400,000 लोगों की जान जा चुकी है। इसका सर्वाधिक कारण है लकड़ी, कोयला, रेफ्रिजरेटर एवं एसी आदि से निकलने वाली कार्बन मोनो ऑक्साइड ।
यदि गाओं की ओर देखें तो लगातार चूल्हे में खाना बनाने के कारण कई भारतीय ग्रमीण महिलाओं के फेफड़े ख़राब हो जाते हैं।
वहीं यदि शहरों में देखें तो लगातार बढ़ती गाड़ियाँ, रेफ्रिजरेटर, एसी आदि के प्रयोग ने सुविधा के बदले हमारी जान की कीमत माँगी है।
2015 में क्लीन एयर इंडिया अभियान वायु में बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए ही प्रारंभ किया गया था। राजधानी दिल्ली के कुतुब मिनार में वृक्ष लगाकर इसका सुभारम्भ किया गया था। वहीं संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस की शुरुआत भी इन्हीं गंभीर समस्याओं को देखते हुए किया गया था।
लेकिन अहम बात यह है की विश्व पर्यावरण दिवस भले ही एक दिन होता हो, हम प्रकृति से प्रत्येक दिन लेते हैं। इसिलिये हमें अपने दायित्वों को भी समझना होगा।