“हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमां फिर भी कम निकले।“ ऐसी न जाने कितनी शायरी हैं जिन्हें हम अपने ज़ज्बात जाहिर करने के लिए अक्सर जुबां पर लाते हैं। यही मिर्ज़ा ग़ालिब की खासियत है कि 220 साल बाद भी उनके शेर हम सबको खुद के हालात पर बने लगते हैं। उनके जन्मदिन पर आज गूगल भी अपना डूडल बनाकर उनको सलाम कर रहा है।
मिर्ज़ा ग़ालिब के शेर आज हमारी जिंदगी का हिस्सा हैं। वैसे तो मिर्ज़ा ग़ालिब जैसी शख्सियत का बखान करना उनकी तौहीन से कम नहीं, लेकिन यहां हम मिर्ज़ा साहब से जुड़ी वो बातें बताएंगे जो उनके चाहने वालों को जरूर जानना चाहिए। मिर्ज़ा साहब का जन्म 27 दिसंबर 1796 को आगरा में हुआ था। उन्होंने 11 वर्ष की उम्र से ही कविताएं और कहानियां लिखनी शुरू कर दी थी। उर्दू, फारसी और अरबी में उनकी जबरदस्त पकड़ थी। उनकी जिंदगी का जैसे परेशानियों से सगा रिश्ता था। जन्म से लेकर आखरी पड़ाव तक उनके जीवन में बड़ी उथल-पुथल रही। ये सब उनकी शायरियों में झलकता है। सारी कठिनाइयों के बावजूद ग़ालिब साहब का जिंदगी के प्रति प्रेम कम नहीं हुआ। 13 साल की उम्र में उनकी शादी उमराव बेगम से होने के बाद वो दिल्ली में बस गए। 15 फरवरी 1869 को इस महान कवि की मृत्यु हुई। जीते-जी मिर्ज़ा ग़ालिब को उनकी रचनाओं के लिए उतनी सराहना नहीं, जितना प्यार और सम्मान उनकी मृत्यु के बाद उन्हें दिया गया। फिल्मी दुनिया में भी ग़ालिब साहब खासे लोकप्रिय हुए। उन पर फिल्म, सीरियल और कई नाटक बने और ये सब हिट रहे। ग़ालिब साहब के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता आप इस शेर से समझ सकते हैं-
“पूछते हैं वो कि ‘ग़ालिब ‘ कौन है? अरे कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या”
