शहीदी दिवस- तीनों में ऐसी देशभक्ति थी कि आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे

 

हितेश पंत (नई दिल्ली)

अपने अंदर देशभक्ति का जज्बा जागृत करना है तो भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के बारे में पढ़ लीजिए। दावा है कि आपके अंदर देशभक्ति की बिजली कौंधने लगेगी। अंग्रेजों की नींद तोड़ने के लिए भरी एंसेंबली में जाकर बम फोड़ना हो या देश की आजादी के खातिर ब्रिटिश पुलिस अधिकारी को सरेआम गोली से उड़ाना हो, ये करने के लिए हिम्मत और देशभक्ति दोनों की जरुरत होती है। आज पूरा देश इन तीनों वीर सपूतों की शहादत को याद कर रहा है।

 

देश के खातिर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 23 मार्च के दिन ही हंसते गाते फांसी के फंदे पर झूल गए थे। देश को स्वतंत्र कराने के लिए कम उम्र में ही इन वीर सपूतों ने अपने प्राणों की आहूति दे दी। इनकी शहादत को श्रद्धांजलि देने के लिए हर साल आज का दिन शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है।

 

बात वहां से शुरू करते हैं जब स्वतंत्रता आंदोलन में लाला लाजपत राय प्रमुख भूमिका में थे। साइमन कमिशन के विरोध में लाला जी सैकड़ों क्रांतिकारियों के साथ थे। विरोध के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घालय हो गए और 17 नवंबर 1928 को उन्होंने दम तोड़ दिया। तब देश के नौजवान क्रांतिकारियों ने लाला जी की मौत का बदला लेने की योजना बनाई।

 

अंग्रेज अधिकारियों के दमन से क्रांतिकारियों में बड़ा गुस्सा था। लाला जी की मृत्यु के ठीक एक महीने बाद 17 दिसंबर 1928 को राजगुरु और भगत सिंह ने अंग्रेज पुलिस अधिकारी जॉन सांडर्स की गोली मारकर हत्या कर दी। इसके बाद अंग्रेज हुकुमत को नींद से जगाने के लिए 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने सदस्यों से भरी केंद्रीय एसेंम्बली में बम फोड़े। लेकिन इसमें कोई हताहत नहीं हुआ।

 

बम फोड़ने के भी भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त वहां से भागे नहीं और इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते रहे। दोनों को वहां गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद राजगुरु की गिरफ्तारी हुई। लाहौर से ही सुखदेव को भी गिरफ्तार किया गया। तीनों पर सांडर्स की हत्या का मुकदमा चला और 24 मार्च को फांसी की सजा मुकर्र की गई। तीनों की फांसी की सजा से देश में विरोध-प्रदर्शनों की आग सी फैल गई।

 

अंग्रेस सरकार इस प्रदर्शन से खौफ में आ गई। लोगों की भीड़ से बचने के लिए अंग्रेजों ने तय समय से एक दिन पहले ही भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी। फांसी से पहले भगत सिंह जेल में लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। पुलिस कर्मियों ने उन्हें फांसी की सूचना दी। इसके बाद तीनों एक दूसरे के गले मिले और हंसते हुए “मेरा रंग दे बसंती चोला, माय रंग दे बसंती चोला गाने लगे।” तीनों की ऐसी देशभक्ति देखकर अंग्रेज अधिकारी भी हैरान थे।

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