हितेश पंत (नई दिल्ली)
आज जब अपने इंटरनेट चलाते हुए गूगल के डूडल पर नजर डाली होगी तो पेड़ को घेरे महिलाओं का एक झुंड नजर आया होगा। चिपको आंदोलन के 45 साल पूरे होने पर गूगल ने डूडल बनाकर सम्मान दिया है। जैसा डूडल में नजर आ रहा है, चिपको आंदोलन में उसी तरह महिलाएं पेड़ों को कटने से बचाने के लिए उनके चारों ओर घेरा बनाकर खड़ी हो जाती थी। तब ये शांतिपूर्ण आंदोलन बेहद सफल आंदोलन साबित हुआ था।
बात 70 के दशक की है। उत्तराखंड में वन माफियाओं की मिलीभगत से पेड़ों का कटान ज़ोरों पर था। सरकारी तौर पर भी वनों की नीलामी की जा रही थी। इससे क्षेत्रीय लोग बहुत आहत थे। साल 1974 को चमोली के रैंणी गांव में करीब 2500 पेड़ों को काटने के लिए नीलामी हुई। 26 मार्च 1974 को इसके विरोध में गौरा देवी नाम की एक स्थानीय महिला ने गांव की महिलाओं का समूह तैयार किया।

महिलाओं के विरोध का सरकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। ठेकेदार कटाई के औजार लेकर गांव पहुंच गया। महिलाओं ने ठेकेदार को चेतावनी दी। वो तब भी नहीं माना तो महिलाएं समूह में पेड़ों के चारों तरफ घेरा बनकार खड़ी हो गई और ठेकेदार से कहा कि पेड़ काटने से पहले हम महिलाओं को काटना होगा। महिलाओं के आगे ठेकेदार को घुटने टेकने पड़े। इसके बाद सरकार ने रैंणी गांव का जंगल काटने के आदेश वापस ले लिए। यहीं से चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई। इसके बाद से गौरा देवी को चिपको वुमन के नाम से जाना जाता है।

सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा और चंडी प्रसाद भट्ट ने चिपको आंदोलन को बृहद रूप दिया। पेड़ों को बचाने के लिए आंदोलन का प्रसार होने लगा। जान हथेली पर रख पेड़ों को बचाने वाली गौरा देवी देशभर में आर्दश के रूप में देखी जाने लगी। विदेशों में भी गौरा देवी चिपको वुमेन के नाम से प्रसिद्ध होने लगी थी। इस आंदोलन के बाद ही 1980 में तब की इंदिरा गांधी सरकार ने प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों के जंगलों की कटाई पर 15 साल रोक लगा दी थी। बाद में ये आंदोलन हिमाचल, राजस्थान, कर्नाटक और अन्य राज्यों में भी फैल गया।
