गजल की दुनिया में एक ऐसी आवाज जिससे शायद ही कोई अछूता हो। जब आप मोहब्बत के रंगों में रंगे हों तो उनको सुनते होंगे, दिल टूटने पर उनकी गजलों में खुद को देखते होंगे। एकांत में मन को सुकून देना हो तो उनकी ग़जलों को हमसफर बनाते होंगे। जगजीत सिंह की ग़जलों में यही तो खासियत थी कि हर संगीत प्रेमी उनसे आज भी जुड़ा है।
अपनी ग़जलों से सबको दीवाना बना लेने वाले जगजीत सिंह का आज जन्मदिन है। उनका जन्म 8 फरवरी 1941 को श्रीगंगनहर राजस्थान में हुआ था। माता पिता ने उन्हें जगमोहन नाम दिया था। कुछ वक्त बाद ज्योतिषि की सलाह पर उनका नाम जगजीत रखा गया। हिंदी गानों के चाहने वालों के बीच गज़ल को लोकप्रियता दिलाने का काम जगजीत की गायिकी ने किया।
ये जगजीत की विशेषता है कि युवाओं से लेकर उम्र दराज तक हर कोई उनकी ग़जलों में खुद को ढुंढता था। आपका मूड चाहे जैसा हो आपको उस तरह की गजल जगजीत सिंह के पिटारे में मिल जाएगी। हिंदी, उर्दू, पंजाबी, भोजपुरी सहित कई भाषाओं में उन्होंने अपनी आवाज का जादू बिखेरा। उनके लाइव कंसर्ट में ग़जलों के बीच लोग ऐसे सुधबुध खोते थे कि कोई सबके बीच झूमले लगता तो किसी के भरी महफिल में आंशू टपकने लगते।
सत्तर के दशक में उनकी पहली एल्बम अनफॉर्गेटेबल्स आई, जिसे लोगों ने काफी सराहा। इसके बाद उन्होंने फिल्मों में गाना शुरू किया। यहां से उन्होंने सफलता का ऐसा रास्ता पकड़ा जहां से वापसी संभव ही नहीं थी। 80 के दशक में आए गाने “होंठो को छूलो तुम” से वे सबके दिलों में समा गए। इसी दौरान उन्होंने कई फिल्मों के लिए गाने गाए, जो काफी हिट रहे।
90 का दशक उनके लिए सदमे की तरह था। इसी बीच उनके इकलौते बेटे विवेक सिंह की मौत हुई। बेटे के जाने के गम में जगजीत सिंह पूरी तरह से टूट गए। उनकी पत्नी और ग़जल गायिका चित्रा सिंह ने तो उसके बाद गाना ही छोड़ दिया। जगजीत सिंह भी एक बदले अंदाज में वापस गायिकी में लौटे थे।
गायिकी में उनकी बादशाहत को देखते हुए साल 2003 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया था। 10 अक्टूबर 2011 को गजलों की दुनिया का ये सरताज दुनिया से रुखसत हो गया। उन्हें दुनिया छोड़े 6 साल से ज्यादा हो गए हों, लेकिन अपनी ग़जलों आज भी लोगों के अंदर जिंदा हैं।


