अक्षय कुमार अपनी फिल्मों से मनोरंजन के साथ समाज को शिक्षित कर रहे हैं। सेनिटेशन समस्या पर बनी ‘टॉयलेट एक प्रेम कथा’ फिल्म के बाद वो नई फिल्म ‘पैडमैन’ लेकर आ रहे हैं। यह फिल्म सस्ते सैनिटरी पैड बनाने वाले अरुणाचलम मुरुगअनंतम के संघर्ष की कहानी है। हम आपको इसी रीयल पैडमैन के बारे में बताएंगे।
बीपीएल परिवार से आते हैं अरुणाचलम-मुरुगअनंतम
कोयंबटूर, तमिलनाडु के रहने वाले अरुणाचलम वो शख्स हैं जिन्होंने महिलाओं के बेहतर स्वास्थ्य के लिए ऐसे काम की शुरूवात की जिसके लिए उन्हें अपने घर में ही उपेक्षित होना पड़ा। बेहद गरीब परिवार से आने वाले अरुणाचलम सिर्फ 9वीं क्लास तक पढ़े हैं। शुरुवाती दिनों में वे एक वर्कशॉप में हेल्पर का काम करते थे। 1998 में एक दिन उन्हें पता लगा कि उनकी पत्नी शांति पैसों की तंगी के कारण पीरियड्स में गंदे कपड़ों का इस्तेमाल करती है।
आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं के लिए उठाया बीड़ा-
इसके बाद अरुणाचलम ने गरीब महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए सस्ते सैनिटरी पैड बनाने का बीड़ा उठाया। उन्होंने रूई से सैनिटरी पैड बनाने का काम शुरू किया। फीडबैक के लिए उन्होंने अपनी पत्नी और बहन की मदद लेनी चाही, लेकिन इस मामले में दोनों से ही अरुणाचलम को बेहतर साथ नहीं मिला। इस काम को बेहतर तरीके से करने के लिए उन्हें महिला वॉलेंटियर की जरूरत थी। इसके लिए अरुणाचलम मेडिकल कॉलेज की छात्राओं के पास भी गए, लेकिन वहां भी उन्हें बेहतर सहयोग नहीं मिला।
खुद पर इस्तेमाल किया सैनिटरी पैड-
महिलाओं का सहयोग नहीं मिलने के बाद अरुणाचलम ने पैड को खुद पर इस्तेमाल करने का फैसला लिया। उन्होंने फुटबॉल ब्लैडर में जानवर का खून भरकर पैदल चलते हुए और साइकिल चलाते हुए खुद पर यूज करना शुरू किया। लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी वह अपने काम से संतुष्ट नहीं हुए। इस बीच परिवार और आस पास के लोग अरुणाचलम को पागल समझने लगे।
परिवार ने छोड़ा साथ-
पत्नी ने उन्हें तलाक का नोटिश भेज दिया। उसके बाद उन्होंने अपने बनाए सैनिटरी पैड की कमी जानने के लिए यूज किए ब्रैंडेड पैड जमा करने शुरू किए। इसके बाद तो उनकी मां ने भी साथ छोड़ दिया। इतने संघर्ष के बाद आखिरकार उन्हें सफलता मिली और 4 साल बाद उन्होंने पैड बनाने की सस्ती मशीन बनाई। वो दुनिया के बेहतर पैड अपने घर पर बनाने लगे।
दुनियाभर में मिली पहचान-
आईआईटी मद्रास ने एक कॉम्पिटीशन में उनके इस नए काम को बेस्ट इनोवेशन का अवॉर्ड दिया। उन्होंने इसे एक बिजनेस की तरह न लेकर, इसे सामाजिक कार्य के तौर पर लिया। ग्रामीण इलाकों में कम कीमत वाली सैनिटरी मशीन लगवाई और वहां की महिलाओं को पैड बनाने का काम दिया। उनका उद्देश्य है कि बेहद कम दामों पर सैनिटरी पैड मुहैया कराए जाएं ताकि देश में ज्यादा से ज्यादा महिला पैड का इस्तेमाल कर सकें। वो इस काम के द्वारा करीब 21000 महिलाओं को रोजगार भी दे रहे हैं। अरुणाचलम के इस बेहतर काम को दुनियाभर में सराहा गया है। भारत सरकार इस प्रयास के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित कर चुकी है।
