” काश ! तुम ये सुन पाती ” आप भी कर सकते है अपने पहले प्यार को डेडिकेट

काश ! तुम ये सुन पाती

विरह प्रेम की पराकाष्ठा है, यूँ तो मेरे संदर्भ में मैंने कभी तुम्हें पाया ही नहीं तो खोना कैसा, वैसे भी इश्क़ का सबसे बड़ा फ़न होता है खोना, तुम्हारे साथ बिताए लम्हें, तुम्हारी यादें, बेशकीमती दौलत है मेरी दिल की, अमानत हो तुम मेरी!! काश ! तुम ये सुन पाती और समझ पाती!!

आज़ बारिश हो रही थी, कि जैसे इन्द्रेश भी रोना चाहते हो तो तुम्हारे वियोग में, वैसे मेरे लिए बरखा रानी का सबसे बड़ा सुकून होता है कि आपके आँसू कोई देख नहीं पाता, अचरज! बाहर के इस कोलाहल में अंदर की छटपटाहट कोई क्यों ही महसूस करें, कमोबेश आँखों से गिरते तुम्हारे ये ख्वाब हर दिन तुमसे और मुहब्बत के लिए मजबूर कर देते हैं!! काश ! तुम ये सुन पाती,  महसूस कर पाती!!

तुम्हारा जब भी जिक्र होगा, और जो मेरी ज़िंदगी का हिस्सा भर नहीं बल्कि – पूरी ज़िंदगी है, कैफे काॅफी डे की यादें एक हूक सी भरेगीं, उन दो ठंडी प्यालियों को मँगवाते वक्त ये तनिक भी आभास न था मेरी मल्लिका, कि वो हर ख्वाब और अरमान को यूँ ही जड़त्व कर देगीं, Robert Frost की एक किताब पढ रहा था, उसकी एक कविता है, “Fire and Ice”. उस पूरी कविता के पन्नों पर तुम्हारा चेहरा उकेर रहा था,  मुझे लगा मानो रात के इस सन्नाटे में, तुम्हारी आवाज़ मेरे दरख्तों के दयारों में आहट देने चली आयी है!! इस आहट को मैं महसूस कर रहा था, काश ! तुम ये सुन पाती !!

जिस दिन उसने 1 बरस से बेहद करीने से सहेज कर रखें जज़्बात तुमसे बाँटे थे, मुसलसल उस दौर में भी तुम्हारे चेहरे से हटकर कुछ बोलने का जी ही नहीं था, तुम्हें कैसे यकीन दिलाऊँ जाँना कि डिबेट्स के किसी भी मंच पर जो शख्स आज़ तलक कभी नि:शब्द नहीं हुआ, वो तुम्हें एक अल्पायु तुतलाते बच्चे की माफ़िक उम्मीद में एकटक देखकर विचारशून्य था, यूथ पार्लियामेंट के दौर में, जिह्वा छालों से भरी थी, मुँह खूँ से लहूलुहान था, एक-एक लफ्ज़ हलक से बाहर लाने का वो अनवरत् संघर्ष तिस पर एक अनंत मुस्कुराहट, पूरी डिबेटिंग कमेटी से लेकर जज तक इसका कारण पूछ रहे थे और मैं लजाते हुए तुम्हारे सादगी से मुस्कुराते चेहरे को वाॅलपेपर पर निहारकर उन तमाम दुःखों में भी आनंदित था, आज़ तुम्हारे दी हुई इन जख्मी यादों पर भी मुझे कोई शिकायत नहीं तुमसे!! काश ! तुम ये सुन पाती !

पुनश्च:-
“इश्क एकतरफा मौत का धंधा है,,
अपनी ही लाश है, और अपना ही कंधा है”!!

 

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Deepak Tenguriya

Political Science Department. ARSD College (Delhi University). Debater, Poet and Content Writer.

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