अगर हम राजनीती की बात करे तो यह एक ऐसा चक्रव्यूह है, जहाँ कब कौन फंस जाएँ ये कोई नहीं कह सकता। वैसे आज हम राजनीतिक दलीलों की बात नहीं करेंगे, बल्कि नेताओ द्वारा दिए गए भाषण की बात करेंगे। आखिर आपको भी तो पता चले कि जब फिसल जाती है नेताओ की जुबान, तब वह किस तरह संभालते है पूरी बात और किस तरह से करते है अपना बचाव। आपने अक्सर देखा होगा कि कई बार कुछ नेता जब मंच पर आते है, तब वह भाषण देने के दौरान बहुत सी बड़ी बड़ी गलतियां कर बैठते है।
जब फिसल जाती है..
यानि अगर हम सीधे शब्दों में कहे तो कई बार जुबान फिसलने के कारण उनकी कही हुई बात का मतलब ही बदल जाता है। तो ऐसे में नेताओ को अपने बचाव के लिए हमेशा तैयार रहना पड़ता है। अब जैसे कि हमारे आदरणीय नेता राहुल गाँधी जी जब भाषण देते है, तो उनसे गलतियां होती ही रहती है। फिर ऐसी स्थिति में वो या तो अपनी बात को मजाक में उड़ा देते है या फिर विपक्षी दल वालो पर प्रहार करना शुरू कर देते है। आपको जान कर हैरानी होगी कि ये केवल राहुल गाँधी का ही नहीं बल्कि सभी नेताओ का मूल मंत्र है। गौरतलब है कि शब्दों के साथ खेलना नेताओ की आदत होती है।
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अब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा जी को ले लीजिये। जिन्होंने दो साल पहले जल्दबाजी में ही सही लेकिन जनता के सामने गलत आंकड़े पेश कर दिए थे। अब यहाँ उनकी जुबान फिसल गई थी या वो कही जाने की जल्दी में थे, ये हम नहीं बता सकते। फ़िलहाल हम तो बस यही कह सकते है कि जब नेताओ से बोलने में गलती होती है, तब वह अपनी गलती को छुपाने के लिए विरोधी दल वालो को टारगेट करना बिलकुल नहीं भूलते। तो अब आप समझ गए होंगे कि भरी सभा में जब फिसल जाती है नेता लोगो की जुबान तब वो क्या करते है।


