दाग़ देहलवी शाहब दीवानगी के उस आसमान पर थे, जहाँ से वापसी नामुमकिन थी. उन्होंने अपने एक ख़त में लिखा कि अगर मुन्नी बाई उन्हें ख़त का जवाब नहीं देंगी, तो वो ज़हर खा खुद को ख़त्म कर लेंगे. दाग़ ने 1881 में एक बार फिर मुन्नी बाई को रामपुर के मेले में आने का बुलावा दिया. मुन्नी बाई ने भी उन्हें कोलकाता आने का बुलावा भेजा.
दाग़ देहलवी दिल्ली से लखनऊ और पटना होते हुए, अपना लम्बा सफ़र ख़त्म कर जून, 1883 में कोलकाता पहुचे. कोलकाता पहुच कर उन्होंने नाख़ुदा मस्जिद के पास रहकर 3 महीने बिताये.
रामपुर के नवाब की मौत के बाद, दाग़ 1887 में हैदराबाद में रहने लगे. कुछ साल बाद अपने कोलकाता के एक दौरे के दौरान उन्हें ख़बर मिली कि मुन्नी बाई का निकाह एक मौलवी से हो चुका है. इस सच को जानने के बाद भी दाग़ ने मुन्नी को फिर से पाने के लिए एक और ख़त लिखा. जिसमे उन्होंने अपना हाल-ए-दिल बयां करते-करते अपने क़ल्ब में मुन्नी की एहमियत और मुन्नी के बिना उनका अकेलापन उनपर कैसे चोट कर रहा है, ये सारी बातें बयां की.
इस ख़त का जवाब मुन्नी बाई ने दिया तो पर एक शर्त रखी. शर्त ये कि जब तक क़ाज़ी उनका निकाह नहीं कराते और जब तक दाग़ उनके लिए एक एलाहिदा मकान नहीं ले लेते तब तक वो दाग़ को अपनी सूरत भी नहीं दिखाएंगी. दाग़ मसले को सुलझाने में कहीं फँस से गये.
जनवरी, 1902 में मुन्नी बाई ख़ुद दाग़ से मिलने हैदराबाद आयीं. पर अब दाग़ की उम्र 70 हो चुकी थी, फिर भी वो मुन्नी बाई को अपनाना चाहते थे. उम्र के इस दौर में साथी की और भी ज्यादा ज़रूरत होती है. पर ख़ुद को दाग़ का शुभचिंतक कहलाने वालों ने दाग़ को समझाया कि मुन्नी बाई अब बस दाग़ की दौलत के लिए उनके पास आई हैं. मुन्नी बाई को टूटे दिल के साथ कोलकाता वापस जाना पड़ा. दाग़ लिखते हैं:
हाय जीते हैं ना मरते हैं, किस क़यामत के दिन गुज़रते हैं.
खाना-ए-ऐश लुट गया कैसा, हमसे यार छुट गया कैसा.
रात दिन जी रहें हैं मर कर हम, सोहबत-ए-यार हो गयी बरह्म.
या इलाही निजात ग़म से मिले, वो सरापा हिजाब हम से मिले.
वरना उस का ख़याल भी ना रहे, अब है जैसा ये हाल भी ना रहे.
लगभग 2 दशकों तक बुना हुआ इश्क भी अधूरा रह गया. मुकम्मल हुई हैं तो उनकी ग़ज़लें, शायरी, और शेर.