मशहूर शायर दाग़ देहलवी
मिर्ज़ा नवाब खान उर्फ़ दाग़ देहलवी की पैदाइश 25 मई 1831 को, चांदनी चौक दिल्ली में हुई. उन्होंने उर्दू में फारसी लफ़्ज़ों का कम से कम पर बेहतरीन इस्तेमाल करते हुए बेहद रोमानी ग़ज़लें लिखीं. उन्होंने अपना कलम नाम ‘दाग़’ रखा जिसका मतलब है ‘धब्बा’. दाग़ उर्दू के कई नामी शायरों के मोअल्लिम रहे जिनमे मुज़्तर खैराबादी, अल्लामा इक़बाल, बेख़ुद देहलवी शामिल हैं.
दाग़ अपने समय और आज भी बेहद मशहूर शायर तो हैं हीं पर साथ ही एक बेहतरीन आशिक़ भी. एक ऐसे आशिक़ जिसकी शायरी में दर्द और सुकून दोनों ही हैं. दाग़ कोलकाता की एक मशहूर और खूबसूरत तवायफ़ के इश्क में ऐसे दीवाने हुए की उनकी दीवानगी उनकी ग़ज़लों और शेरों में देखते ही बनती है. ‘मुन्नी बाई’ और दाग़ की पहली मुलाक़ात रामपुर के सालाना मेले में बेनज़ीर महल में हुई. पहली नज़र में ही दोनों इश्क की गिरफ्त में आ चुके थे. पर मेले के ख़त्म होते ही दोनों परिंदे बिछड़ने पर मजबूर थे. दाग़ और मुन्नी बाई ने एक दुसरे से ख़त से जुड़े रहने का फैसला किया.
मुन्नी बाई से मिलकर दाग़ लिखते हैं:
इश्क़ नेमत है आदमी के लिए, इश्क़ जन्नत है आदमी के लिए.
दिल इसी से जवान रहता है, मरमिटों का निशान रहता है.
इश्क इमान है ख़ुदा रखे, ये मेरी जान है ख़ुदा रखे.
मुन्नी बाई से जुदा होकर दाग़ लिखते हैं:
आ गयी हिज्र की घड़ी सर पर, ये बला झेलनी पड़ी सर पर,
हसरत आलूद वो निगाहें थीं, शरार आमेज़ मेरी आहें थीं.
रस्म-ए-उल्फत के हो गए इक़रार, ख़त किताबत के हो गए इक़रार.
मुन्नी बाई भी एक शायरा थीं, उन्होंने अपना कलम नाम हिजाब रखा, वो इस ख़त के जवाब में लिखतीं हैं:
जी नहीं चाहता है जाने को, पर चले हैं क़लक़ उठाने को.
हम तो भूखे हैं आदमियत के, आदमियत के साथ उल्फ़त के.
ऐसे वैसों से जी नहीं मिलता, दाग़ सा आदमी नहीं मिलता.
उनकी आशिक़ी मुकम्मल हो सकी या नहीं… क्रमशः