भारत के चार्ली चैप्लिन राज कपूर के सपनों की इमारत जिसे उन्होने अपने खून पसीने से समृद्ध किया वो भले ही आज बाजार की दुनिया का शिकार हो गया हो, भले ही आज वो मात्र खंडहर रह गया हो लेकिन वो आशियाँ है जहाँ महान अभिनेता राज कपूर ने अपनी पहचान बनाई थी। आर.के. फिल्म्स एँड स्टूडियो से राज कपूर ने बतौर निर्माता अपने सफ़र की शुरूआत की थी। इस सफ़र में उन्हें कभी सफलता मिली तो कभी असफलता भी मिली और ये आर.के. स्टूडियो राज कपूर के सफ़र का गवाह है। सन 1948 में “आग” राज कपूर की बतौर निर्देशक पहली फिल्म थी औरआर.के .फिल्म्स एँड स्टूडियो में बनी यह पहली फिल्म भी थी।
उसके बाद “बरसात” की सफलता ने राज कपूर को बतौर निर्देशक व बतौर अभिनेता फ़िल्मी दुनिया में स्थापित किया।

“आवारा” राज कपूर की सामाजिक जागरुकता पर बनी फ़िल्मों में से एक थी।
“बूट पॉलिश” को कान्स में नामंकित भी किया गया था। तथा इसे भारत सरकार द्वारा उत्कृष्ट फीचर फिल्म का पुरुस्कार भी प्राप्त हुआ था। इसके बाद इन्होने “जागते रहो” फिल्म बनाई जिसमें राज कपूर के अभिनय कौशल ने सभी को एक बार और हैरान किया।
“श्री 420” आर.के.फिल्म्स एँड स्टूडियो की अगली राष्ट्रीय पुरुस्कार विजेता फिल्म है। जिसका गाना “मेरा जूता है जापानी” आज भी लोगों के जुबान में बसा हुआ है। “जिस देश में गंगा बहती है” इस बैनर की अगली राष्ट्रीय पुरुस्कार विजेता फिल्म बनी। लेकिन राज कपूर को अगली फिल्म “मेरा नाम जोकर” की असफलता ने भीतर से झंक्झोर दिया। हालांकी आज इसे हिंदी सिनेमा के मील के पत्थर के रूप में देखा जाता है।
“सत्यम शिवम सुन्दरम” इस बैनर की अगली राष्ट्रीय पुरुस्कार विजेता फिल्म बनी।
राज कपूर की फ़िल्मों में हास्य. व सामाजिक बुराइयों का चित्रण अद्भुत है। “राम तेरी गंगा मैली” उनमें से एक है और यही वजह है की इसने जनता के बीच लोकप्रियता हासिल करने के साथ साथ राष्ट्रीय पुरुस्कार भी अर्जित किया।
आर.के.फिल्म्स एँड स्टूडियो मात्र एक स्टूडियो नहीँ था वो राज कपूर के सपनों का आशियाना था। जिस स्टूडियो ने इतनी नायाब फिल्में दीं आज वो मात्र पत्थर की इमारत के रूप में बाजार में बिकने जा रहा है।