जब बात फ़िल्मों की आती है तो शांत रहने वाले लोग भी बोलने लगते हैं। कोई भी खास मौका हो घर का कोई न कोई बच्चा किसी फिल्म के किरदार या किसी फिल्म के संवाद से सभी को हँसा ही देता हैफिल्में मनोरंजन का साधन हैं लेकिन हमें यह भी नहीँ भूलना चाहिये की मनोरंजन के साथ इनमें सामाजिक यथार्थ का कलात्मक चित्रण भी होता है। मैथिली शरण गुप्त जी ने कवि के संबंध में लिखा है –
“केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिये,उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिये”यही बात प्रत्येक कला में लागू होती है । हम यहाँ उन बेहतरीन फ़िल्मों का ज़िक्र करने जा रहे हैं जो अपने समय को पर्दे पर प्रदर्शित करते हैं और व्यक्ति को चिन्तन के स्तर पर गतिशील बनाते हैं।
- दो बीघा ज़मीन1953 में बिमल रॉय के निर्देशन में बनी यह फिल्म ज़मींदारी प्रथा में किसानों के किसान से मज़दूर बनने की कहानी है। बलराज शाहनी वा नीरूपा रॉय के अभिनय ने किरदारों को सजीव कर दिया है ।
- गरम हवा1947 में आज़ादी के साथ विभाजन की त्रासदी हमारे देश का बहुत बड़ा यथार्थ है।इसी यथार्थ का कलात्मक चित्रण हमें इस फिल्म में मिलता है। बलराज शाहनी द्वारा अभिनीत इस फिल्म में सामाजिक यथार्थ का कलात्मक चित्रण बहुत मार्मिक है।
- मदर इंडियाशायद ही कोई रस होगा जो इस फिल्म में ना हो। महबूब खान का निर्देशन व नर्गिस दत्त का अभिनय इस फिल्म में बेमिशाल है। यह पहली भारतीय फिल्म है जो ऑस्कर के लिए नामांकित हुई थी और मात्र 1 वोट से पीछे रह गई थी।
- आक्रोशदलितों की स्थिति क्या है हमारे देश में इस सामाजिक यथार्थ का कलात्मक चित्रण हम इस फिल्म में पाते हैं। ओम पुरी, अम्बरीश पुरी व नसिरुद्दीन शाह द्वारा अभिनीत यह फिल्म हिंदी सिनेमा में विशेष स्थान रखता है ।
- 1947 अर्थ, वाटर व फायरदीपा मेहता द्वारा निर्देशित ये फिल्में भले ही सेन्सर बोर्ड द्वारा बैन कर दी गई हों लेकिन ये फिल्में सामाजिक यथार्थ का कलात्मक चित्रण ही हैं इस बात को सेन्सर बोर्ड नकार नहीँ सकता।
- हैदर, मक़बूल व ओमकाराशेक्सपियर के तीन प्रसिद्ध नाटकों हम्लेट, मक्बेथ व ओथेलो को भारतीय सन्दर्भ में स्थापित कर विशाल भारद्वाज ने भारतीय सामाजिक यथार्थ का कलात्मक चित्रण बड़ी ही रोचक शैली में किया है। मुख्य बात यह है की पात्र वही हैं जो शेक्सपियर के थे।
- द डर्टी पिक्चरविद्या बालन का उमदा अभिनय कला तो बेमिशाल है ही, इस फिल्म के संवाद में हमारा समाज स्पष्ट दिखाई देता है। हमारे दोगले पन को ये फिल्म बड़ी ही खूबसूरती से पेश करती है।
- न्यूटनहमारा देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और इसी लोकतंत्र का काला सच हमें इस फिल्म में दिखाई देता है। यही नहीँ दहेज आदि सामाजिक यथार्थ को बड़ी सहजता से इस फिल्म में दिखाया गया है।
इन फ़िल्मों में हमें मनोरंजन के साथ सामाजिक यथार्थ का कलात्मक चित्रण बड़ी सहजता से दिखाई देता है। आपने यदि अभी तक इन फ़िल्मों को नहीँ देखा है तो ज़रूर देखिये।