हिंदी सिनेमा में स्त्री का बदलता रूप : प्रथम भारतीय फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ में स्त्री पात्र ‘तारामती’ के चरित्र को जीवन्त करने वाले पुरुष कलाकार ‘हरी सलुंके’ से लेकर ‘अछूत कन्या’ की नायिका, देवदास(1935) की ‘पारो’, ‘औरत’(1940) की ‘सरदार अख्तर’,’बरसात’ की ‘रेशमा’,’मदर इंडिया’ (1957)की ‘राधा’, ‘मुग़ल- ए- आज़म’की ‘अनारकली’ ‘अर्थ’ की ‘पूजा’, ‘एतराज़’ (2004) की ‘सोनिया’, ‘जिस्म’ की नायिका,’दबंग’ की ‘मुन्नी’,’क्वीन’ की ‘रानी’ से होते हुए ‘पिंक’ की नायिकाओं के रूप में हमारे सामने है जो अपने साथ हुए दुर्व्यव्हार के खिलाफ बोलने का हौसला रखती है।
ये स्त्रियाँ कभी पारिवारिक बन्धनों में बँधी हैं,कहीं प्रेम में समर्पित हैं, कहीं सामाजिक बुराइयों का पुरज़ोर विरोध करती हैं तो कहीं उपभोक्तावादी बाजार की शिकार हो शीला व मुन्नी के रूप में आ रही हैं तो कहीं धन के वशीभूत होकर किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।
हिंदी सिनेमा जिस प्रकार अपने विषय,चरित्र,तक्नीक में परिवर्तन करता रहा है, उसी प्रकार स्त्री के विविध रूपों को भी पर्दे पर प्रदर्शित करता रहा है ।
प्रारंभिक हिंदी सिनेमा की स्त्री
1926 में हिंदी सिनेमा को प्रथम निर्देशिका फातिमा बेगम के रूप में मिली। यहाँ से कई महिला निर्देशिकाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
1930-35 का दौर भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति का दौर था। उसी समय महिलाओं की शिक्षा,पर्दा प्रथा,अछूतों की समस्या आदि विशेष मुद्दे समाज के सामने थे । सिनेमा समाज से अलग ना जाकर इन्हीं मुद्दों के इर्द गिर्द जाति प्रथा पर ‘अछूत कन्या’ (1936) फिल्म बनाकर स्त्री के उस रूप को सामने लाने में सक्षम हुआ जहाँ वो समाज में व्याप्त जाति प्रथा से टकराती है। समाज में उच्च जाति के युवक से अपने प्रेम को स्वीकार करती है। लेकिन व्यापक स्तर पर ऐसी भूमिका प्रारंभिक हिंदी सिनेमा में कम ही मिलती हैं। अधिकान्श स्त्री के पारम्परिक ममतामयी,पतिव्रता रूप को पर्दे पर दिखाता रहा।
1940 में बनी फिल्म ‘औरत’ उस स्त्री को सामने लाती है जो ज़मीदार की मार झेलते हुए अपने परिवार का पालन पोषण करती है लेकिन एक दिन उसके विद्रोह में स्वर तीखा कर ही देती है।
1950 से 1990 का हिंदी सिनेमा
1950 के बाद से हमें स्त्री के उस रूप से साक्षात्कार होता है जहाँ वो मात्र समाज से नहीँ जूझती बल्कि अपने स्व को भी पहचानती है। बिमल रॉय,महबूब खान,राज कपूर, गुरुदत्त, आदि जैसे निर्देशकों ने नारी के कई रूपों के साथ उसके उस रूप को भी दिखाया जहाँ वो स्वयं से भी प्रश्न करती है। एक तरफ़ माँ,बहन,पत्नी,प्रेमिका तो दूसरी तरफ़ सिर्फ स्त्री।
‘साहिब बीबी और ग़ुलाम’ की ‘छोटी बहू’ अपने पति की खुशी के कारण स्वयं को नशे का आदी बना लेती है। ‘उसकी रोटी’(1969) की ‘बालो’ अपनी सौतन के बारे में जानते हुए भी पति से कुछ नहीँ कहती।1974 की फिल्म ‘अँकुर’ की गरीब नौकरानी जो ठाकुर का शिकार हो जाती है, और ‘शतरंज के खिलाड़ी’ की बेगम जो पति के साथ वक्त बिताने के लिए सिर दर्द का बहाना करती है । ये सभी एक बात में समान हैं की ये सामाजिक दबाव व आर्थिक मजबूरियों के कारण चुप हैं। लेकिन हम ‘भूमिका’(1977) की नायिका को देखते हैं जो अपने भरे पूरे घर और सच्चे प्रेम की तलाश में अपने लालची पति को छोड़ देती है।मिर्च मसाला (1977) की नायिका ‘अँकुर’ की नायिका से भिन्न अत्याचार के खिलाफ आवाज़ उठाती है।1982 की फिल्म ‘अर्थ’ की ‘पूजा’ अपने पति के विवाहेत्तर संबंध के बारे में जानने के बाद ‘बालो’ की तरह उसके साथ रहती नहीँ है बल्कि अपने आप पर भरोसा रख अपनी एक नयी दुनिया बसा लेती है और आखिरी में पति के वापस आने पर प्रश्न करती है की “तुम्हारी जगह अगर मैं होती तो क्या तुम मुझे अपना लेते ?” पूजा का ये प्रश्न स्त्री के उस रूप को सामने लाता है जहाँ वो अब मात्र पतिव्रता पत्नी नहीँ बल्कि एक चिन्तन करने वाली महिला है।
1990 के बाद का हिंदी सिनेमा
1980-90 के बाद स्त्रियों ने घर की चार दीवारों से बाहर कर्यक्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करनी प्रारंभ की। और इसका प्रतिबिंब हमें हिंदी सिनेमा में भी दिखाई देता है। वहीं 1990 का दौर उपभोक्तावादी व्यवस्था में स्त्री को अपनी गिरफ़्त में लेता दिखाई देता है। जहाँ बॉक्स ऑफीस पर छा जाने का दबाव था तो स्त्री दर्शकों को सिनेमा हॉल तक लाने का माध्यम।
स्त्री को कहीं ‘तन्दूरी मुर्गी’ बनाया जा रहा है कहीं ‘मुन्नी को बदनाम’ किया जा रहा है तो कहीं ‘शीला जवान’ हो रही है।
लेकिन इस बात से भी इंकार नहीँ किया जा सकता कि, अब सिनेमा स्त्री के कई रूपों को लेकर सजग हुआ। हमें पर्दे पर “फूल बने अंगारे” की नम्रता सिंह दिखती है जो साहस और वीरता के साथ भ्रष्ट राजनीतिज्ञों का सामना करती है तो वहीं “दिलवाले दुल्हनिया ले जायेन्गे”, “साजन”, “हम आपके हैं कौन”, “ कुछ कुछ होता है” आदि की नायिकाएँ अपने प्रेम के लिए संघर्ष करती ही दिखाई देती हैं। एक तरफ़ स्त्री सजी हुई सुंदर वस्तु के रूप में है तो दूसरी तरफ़ उस खलनायिका के रूप में जो अपने स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।
2001 में राजकुमार संतोषी द्वारा निर्देशित ‘लज्जा’ एक ऐसी नारी को प्रस्तुत करता है जो उसके ऐब जानने के बाद उसे छोड़ कर चली जाती है। ये ‘साहिब बीबी और ग़ुलाम’ की छोटी बहू की तरह नहीँ है जो अपने पति को स्वामी मान कर उसका ग़लत काम में साथ दे।
इसी समय स्त्री का एक अन्य रूप जो व्यापक तौर पे दिखता है वो है उसका खलनायक का रूप।
‘एतराज़’, ‘जिस्म’, ‘मर्डर’, ‘मक्बूल’, ‘कॉर्पोरेट’, ‘रकीब’ आदि वो रूप दिखाते हैं जिसमें वो अपने मकसद में कामयाब होने के लिए अपने जिस्म को भी मोहरा बनाती है। ऐसा नहीँ है की नारी का ये स्वार्थी रूप पहले नही था ‘श्री 420’ में भी ‘माया’ थी लेकिन वो चरित्र नायिका के रूप में नहीँ थे।
स्त्री की इन भूमिकाआें के साथ उसका सशक्त रूप भी पर्दे पर आया जो व्यापक रूप से अब तक हिंदी सिनेमा से अछूता ही रहा। ‘दमन: ए विक्टिम ऑफ मेरिटल वॉइलेंस’ की रवीना टंडन अपने संतान के लिए पति पर भी वार कर सकती है ठीक उसी तरह जिस तरह अर्थ की नौकरानी ने बेटी के दाखिले में दखल देने वाले अपने पति का खून कर दिया था। फ़र्क इतना है की वो 1982 में नौकरानी थी और आज नायिका है।
‘लज्जा’, ‘फिर मिलेंगे’, ‘चक दे इंडिया’, ‘क्वीन’, ‘कहानी-2’, ‘गुलाब गैंग’ ‘पिंक’ आदि के स्त्री पात्र अपने अधिकारों के लिए लड़ती दिखाई देती हैं तो वहीं ‘कहानी-2’ की विद्या ‘एक हसीना थी’ की ‘सारिका’ स्त्री के उस रूप को चुनौती देती हैं जहाँ वो हमेशा एक सुंदर सजी हुई युवती ही है।