“आर्टिकल 15” अनुभव सिन्हा द्वारा निर्देशित यथार्थ पर आधारित एक प्रभाव शाली फिल्म है। ये अधिक प्रभावशाली तब हो जाती है जब अनेकता में एकता मात्र गानों और स्लोगनों में रह गया हो। विश्व चाँद पर पहुँच चुका है,लेकिन हम आज भी उसी छोटी मनासिकता का शिकार हैं,जहाँ जातिगत और धर्मगत भेद हम पर हावी हैं। भारतीय सम्विधान को कई देशों के सम्विधानों के अध्ययन के बाद बनाया गया है। जिसमें मूल अधिकारों की बात अमेरिका के सम्विधान से लिया गया है।
क्या है आर्टिकल 15-
भारतीय सम्विधान के भाग 3 के अनुच्छेद 12 से 35 तक मूल अधिकारों को स्पष्ट किया गया है। अनुच्छेद 15 (आर्टिकल 15) के अन्तर्गत यह स्पष्ट किया गया है की “राज्य किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म,जाति,लिंग,नस्ल या जन्म स्थान के आधार पर विभेद नहीँ कर सकता।”
सम्विधान में भले समानता का अधिकार स्पष्ट किया गया हो लेकिन ज़मीनी स्तर पर निम्न वर्ग की स्थिति पशु से भी बदतर है। “वो लड़कियाँ मजदूरी में सिर्फ 3 रुपये बढ़ाने की मांग कर रही थीं,आप जो बिसलरी का पानी पी रहे हैं उसके 2 या 3 घूँट के बराबर इसिलिये उनका रेप कर दिया गया ताकि उन्हें उनकी औकात याद रहे ” “आर्टिकल 15” का यह संवाद देश की स्थिति को स्पष्ट करता है। दुःखद बात यह है की हमारा प्रशासन और सरकार दोनों इस ओर उदासीन हैं।
यथार्थ घटना की छानबीन-
फिल्म 2014 में बदायुं के क़टरा शहादत गंज गाँव में घटित घटना पर आधारित है। जहाँ दो चचेरी बहनों का सामूहिक बलात्कार कर दिया गया था। मौत की गुत्थी सुलझाने के बजाय पुलिस भी मामले को रफा दफ़ा करना चाहती थी, फिल्म में अायुष्मान खुराना एक ईमानदार पुलिस अफसर के रूप में मामले की तह तक जाने की कोशिश करते हैं। इसी छानबीन के दौरान कई तथ्य उजागर होते हैं। जिसमें राजनीतिक स्वार्थ व अन्य शामिल हैं। फिल्म के माध्यम से देश के डार्क साइड को दिखाने का प्रयास किया गया है जहाँ दलितों का लगातार शोषण हो रहा है। ये मात्र एक प्रकरण है लेकिन कई ऐसे मामले हैं जिन्होने व्यक्ति के साथ ही दम तोड़ दिये होंगे।
आर्टिकल 15 एक ज़रूर देखने वाली फिल्म है। जो आपको भीतर तक झनकृत ज़रूर करेगी।
और अगर आपको यह फिल्म अच्छी लगे तो आपको गोविंद निहलानी द्वारा निर्देशित फिल्म “आक्रोश” भी ज़रूर देखनी चाहिये।