हिन्दू नए वर्ष के आगाज में आज 6 अप्रैल के दिन पूरे महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा का त्योहार मनाया है। गुड़ी पड़वा को विजय दिवस की तरह माना जाता है और विजय पताका फहराकर नए साल का स्वागत किया जाता है। आइए जानते हैं गुड़ी पड़वा से जुड़ी कुछ खास बातें।
भारत में अलग-अलग जगहों पर हिंदू नव वर्ष को अलग-अलग नाम से बुलाया जाता है। देशभर में चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को धूमधाम से मनाते हैं। उत्तर में इसे नया साल, नवरात्रि कहते हैं और दक्षिण में उगादी। वहीं, महाराष्ट्र में इसे गुड़ी पड़वा कहते हैं। मुख्य रूप से इस त्यौहार को महाराष्ट्र में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। गुड़ी यानी विजय पताका पड़वा यानि प्रतिपदा। मराठी मान्यता के अनुसार इस दिन शालिवाहन नाम के एक कुम्हार-पुत्र ने मिट्टी के सैनिकों की सेना से अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी। इसी जीत को जश्न मनाने के लिए लोग आज भी इस दिन अपने घर में गुड़ी यानि विजय पताका फहराते हैं और उसकी श्रद्धा और भाव से पूजा करते हैं। गुड़ी पड़वा के दिन महाराष्ट्र के हर एक घर में गुड़ी हाथों से बना कर घरों पर लगाई जाती है। साथ ही साथ देशभर में गुड़ी पड़वा, नए साल के रूप में मनाते हैं क्योंकि ऐसा मानना है कि इसी दिन से ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी और इसी दिन से सतयुग शुरु हुआ था। माना जाता है कि सृष्टि की रचना के बाद इसी दिन पर और भी कई चीजें हुईं थीं जिसकी वजह से इस त्यौहार को बड़े ही हर्ष और उल्लास से मनाया जाता है। माना जाता है कि इस दिन प्रभु श्रीराम ने बालि का वध कर दक्षिण भारत में रहने वाले लोगों को उसके आतंक से मुक्त करवाया था, इसलिए वहां के लोग गुड़ी के रूप में अपने घर में विजय पताका फहराते हैं।
महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा के दिन मराठी महिलाएं नौवारी यानी 9 गज लंबी साड़ी पहनती हैं और पुरुष धोती-कुर्ता या कुर्ता-पयजामा पहनते हैं। सूर्य देव की पूजा के बाद गुड़ी की पूजा करती हैं। इस दिन घरों में पुरन पोली बनाई जाती है और सभी को बांटी भी जाती है। नाच गाने से महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा का त्यौहार खुशियों के साथ मनाया जाता है। बात करें, उत्तर भारत में गुड़ी पड़वा के त्यौहार को नवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। माना जाता है कि आदिशक्ति ने इसी दिन अपने नौ रूप दिखाए थे। इसलिए इस दिन से नवरात्र आरंभ होता है और नौ दिन तक मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है।

