आज हम चाँद पर पहुँच चुके हैं । टेक्नॉलजी में कहीं पीछे नहीँ हैं। हमारे यहाँ विश्व में सबसे ज्यादा फिल्मे बनती हैं। भारत कई मामलों में विश्व के विकसित देशों का मुकाबला भी कर रहा है और टक्कर भी दे रहा है।
इन सभी तथ्यों के बीच आज भी जहाँ भारत को ना सिर्फ सर झुकाना पड़ता है बल्कि शर्मिन्दा भी होना पड़ता है वो है गंदगी। अस्वक्ष खान पान से होने वाली बीमारियों जैसे टाइफोय्ड आदि से मरने वालों की संख्या में दक्षिण एसियाई देशों का प्रतिशत अधिक है।
लेकिन सवाल यह है की इस समस्या के समाधान को प्रभावी कैसे बनाया जाए? और उससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न समय कितना लगेगा ?
प्रभावी बनाने के तरीकों पर अगर हम ध्यान दें तो सबसे पहले बात आती है। “स्वच्क्ष भारत”अभियान की । हमने अभियान के कई पहलुओं पर विचार किया होगा लेकिन जिस बात पर ज़ोर देने की सबसे ज्यादा जरूरत है वो है इस वाक्य पर ध्यान देने की “एक कदम स्वच्क्षता की ओर”। ये पहला कदम प्रत्येक नागरिक को उठाना होगा। इसलिए नहीँ की देश को स्वच्क्ष रखना है बल्कि इसलिए की “मुझे गंदगी नहीँ फैलाना है”। अपनी हर वो आदत जो बड़ी ही सहजता से हमारे भीतर विराजमान है उस पर 2 बार विचार करके।
रास्ते में चलते हुए थूँक देना,आइस-क्रीम खाकर पैकेट रास्ते में फेंक देना,च्विन्गुम थूक देना,ट्रेन में कुछ भी खाने के बाद रैपर खिड़की से पार कर देना आदि आदि। इन सभी तरह के कामों के बाद एक बार ये जरुर सोचना चाहिये की “इसके बाद क्या “? और इसके बाद जो व्यक्ति आएगा वो मैं होता/होती तो कैसा महसूस होता। इस प्रश्न के साथ एक सामान्य तर्क आता है वो ये है की, “सिर्फ मेरे सोचने से क्या होगा”? इसके जवाब में ये हमेशा याद रखिए की आप कुछ अलग अनुभव करेंगे,कुछ अच्छा अनुभव करेंगे, लोगों की भीड़ में स्वयं को गौरन्वित महसूस करेंगे,और अगली बार जब किसी भी तरह की स्वक्षता की बात आएगी तो वकृत्व कला का झण्डा नहीँ फैलाना पड़ेगा बल्कि आपका व्यक्तित्व बोलेगा।
सभी अपने सन्तानों की सुविधा के लिए कई तरह के उपाय करते हैं। लेकिन, स्वक्ष हवा,स्वक्ष पानी और स्वक्ष जमीन जब तक नहीँ होगा तब तक किसी भी तरह का उपाय व्यर्थ है।

