हितेश पंत (नई दिल्ली)
महान शिक्षाविद और देश के पहले उपराष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन को आज पूरा देश श्रद्धांजलि दे रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में वे पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। वे ऑक्सफोर्ड से लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय समेत देश के कई प्रमुख विश्वविद्यालयों के मुखिया रहे। इतने अहम पदों पर रहते हुए भी उनके अंदर हमेशा नया सीखने की इच्छा बनी रही। वो छात्रों से भी नई बातें सीखने को हमेशा तैयार रहते थे।
डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ऐसा नाम हैं जिन्हें शिक्षा के क्षेत्र में आदर्श माना जाता है। उनका जन्म 5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुनति नाम के गांव में हुआ। बचपन से ही वे कुशाग्र बुद्धि के थे। उनकी महानता इसी बात से पता चलती है उन्होंने महज 12 साल में ही बाइबिल और स्वामी विवेकानन्द को अच्छे से पढ़ लिया था। शुरुआती पढ़ाई गांव के स्कूल और वेल्लूर से करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने मद्रास क्रिश्चिन कॉलेज में दाखिला लिया।
दर्शनशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएट करने के बाद डॉ राधाकृष्णन ने 1916 में मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज में पढ़ाना शुरु किया। उनकी विशिष्टता को देखते हुए उन्हें 1931 में आंध्र प्रदेश विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया। 1936 में वो ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी में पढ़ाने चले गये। इसके बाद फिर भारत लौटे और काशी विश्वविद्यालय में कुलपति रहे।
स्वतंत्रता के बाद वो 1947 से 1949 तक संविधान सभा के सदस्य रहे। 1952 में उन्हें रूस में भारत का राजदूत बनाकर भेजा गया। डॉ राधाकृष्णन 13 मई 1952 को देश के पहले उपराष्ट्रपति नियुक्त किए गए और लगातार 10 वर्षों तक वे इस पद पर रहे। मई 1962 को उन्हें देश का दूसरे राष्ट्रपति नियुक्त किया गया।
उपराष्ट्रपति रहते हुए उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया। शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें सर की उपाधि दी। शिक्षा में उनके उल्लेखनीय कार्यों को देखते हुए हर साल 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। 1975 में आज ही के दिन लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया।