हितेश पंत (नई दिल्ली)
जिनके इरादे मजबूत और मेहनत में कोई कमी नहीं होती सफलता उन्हीं को मिलती है। सफलता में धर्म, अमीरी-गरीबी या जेंडर आड़े नहीं आता। ट्रांसजेंडर अत्री पर ये बात एकदम सटीक बैठती है। अक्सर लोगों का रवैया ट्रांसजेंडरों के साथ अच्छा नहीं होता। कई जगह समाज में उन्हें बराबर का हक तक नहीं मिलता। लेकिन अत्री ने अपनी लगन से हक हासिल किया और अब वे सिविल सर्विस एग्जाम में शामिल होने वाली हैं।
अत्री बंगाल की पहली ऐसी ट्रांसजेंडर बनने जा रहीं हैं जो सिविल सर्विस एग्जाम देंगी। 28 साल की अत्री स्कूल टीचर हैं। टीचर बनने के लिए भी अत्री को समाज में कई बार अपने हक की लड़ाई लड़नी पड़ी। प्रतिभा की धनी होने के बाद भी ट्रांसजेंडर होने के कारण समाज उन्हें टीचर बनने के लिए कई चुनौतियों का समाना करना पड़ा।
अत्री सिविल सेवा में अपना भविष्य बनाना चाहती हैं। उन्होंने जब बंगाल पीसीएस में आवेदन फॉर्म भरा तो जेंडर वाले कॉलम में मेल और फीमेल ऑप्शन ही थे। उन्होंने कई जगह मदद की गुहार लगाई। कहीं सुनवाई नहीं हुई तो हाईकोर्ट पहुंच गई। हाईकोर्ट ने बंगाल लोकसेवा आयोग को फटकार लगाते हुए जेंडर वाले कॉलम में अन्य का ऑप्शन देने के निर्देश दिए।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने उन्हें आरक्षित वर्ग में शामिल करने का भी आदेश दिया। हाईकोर्ट के दखल के बाद अत्री 29 जनवरी को बंगाल लोक सेवा आयोग की परीक्षा में शामिल हो पाई। इसके बाद भी उन्होंने अपनी मेहनत जारी रखी है, क्योंकि अत्री का लक्ष्य सिविल सेवा में जाकर देश सेवा करना है।
अत्री ने इस साल होने वाली संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा में भी आवेदन किया है। सिविल सेवा परीक्षा के लिए वो कड़ी मेहनत कर रही हैं। अत्री इस साल होने वाली सिविल सेवा की प्री एग्जाम में शामिल होंगी। अत्री उन तमाम युवाओं के लिए एक प्रेरणा हैं जो परिस्थितियों को अपनी नाकामयाबी की वजह बताते हैं।