शीतल अभी कॉलेज से आर्इ ही थी, की तभी घर की घंटी बजी। अपना बैग वहीं टेबल पर फेंकते हुए अपने कमरे के दरवाजे तक ही आर्इ थी की देखा बड़ी बहन के सिर और हाथ में कई घाव हैं। सभी अपना काम जस का तस छोड़ उसकी ओर दौड़ पड़े। सभी क्या हुआ,कैसे हुआ पूछ ही रहे थे की अचानक शीतल को दादी माँ की बूढ़ी, हाँफती हुई आवाज़ सुनाई दी। वो वही वाक्य बोल रही थीं जो वो प्राय: बोलती हैं “और इतनी सी बात में कोई घर छोड़ कर आता है भला ? शादी के बाद ससुराल ही लड़की का घर होता है, मायका नहीं।” ये बात पूरी हुई नहीँ थी की, तभी चाची अपने साहित्य प्रेम को प्रकट करती हुई,कहने लगी “अबला जीवन तेरी यही कहानी,आंचल में है दूध और आँखों में पानी।”
लगभग आधे घंटे तक सभी की सलाहों का सिलसिला चलता रहा। तभी अपने कमरे के दरवाज़े पर खड़ी शीतल ने स्थिति को समझते हुए कहा “इन्हें पहले डॉक्टर के पास ले चलते हैं, कितना खून पहले ही बह चुका है।” इसी अफ़रा तफ़री में पिताजी ने कैब बुलाया और शीतल के साथ दोनों अस्पताल की ओर रवाना हुए।
गाड़ी महानगर की चौड़ी,चकमकाती सड़क के बीच रात 8:40 में दौड़ रही थी। और गाड़ी के भीतर शीतल की बहन की सिस्कियां थीं और पिताजी के चेहरे पर गहरा सन्नाटा। अब बेटी का क्या होगा? क्या तलाक़ ही अब आखिरी रास्ता है ? अब इसे कौन सम्भालेगा? ये सभी प्रश्न पिता होने के नाते उनके माथे पर स्पष्ट दिख रहा था। तभी ड्राईवर की सीट से आवाज़ आर्इ “मेरा आदमी भी ऐसा ही था साहब। छोड़ दिया मैने।” अपनी परेशानियों के आगे उन्हें दिखा ही नहीँ की चालक एक महिला है। शायद उन्होने कभी सोचा भी नहीँ होगा। इसमें उनकी भी गलती नहीँ। हमारे समाज में कोई भी कैब ड्राईवर की कल्पना पुरुष के रूप में ही करेगा।
“तुम्हें डर नहीँ लगता कैसे कैसे लोग मिलेंगे?” शीतल के इस प्रश्न पर वो मुस्कुरा कर बोली “डर ही तो हर बार हमें रोक देता है, कभी समाज का, कभी अपनों का और कभी हमारे खुद के भीतर का”
शीतल के सामने इस वक्त उस ड्राईवर का ये जवाब था और चाची की पंक्तियां।