उत्तरी ध्रुव या आर्कटिक क्षेत्र दुनिया का रेफ़्रिज़रेटर माना जाने वाला क्षेत्र है। यहां बेहद सर्द मौसम होता है। साल के अधिकतर महीनों में यहां बर्फ की मोटी चादर बिछी होती है। ग़ौरतलब है कि, जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक की बर्फ़ तेज़ी से पिघल रही है।
किस तरह जलवायु परिवर्तन का असर उत्तरी ध्रुव पर पड़ रहा है? आर्कटिक का हमारी धरती पर कैसा और कितना असर है? ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब की खोज में देशों के वैज्ञानिकों ने एक मिशन प्लान किया।
इस मिशन के तहत सभी वैज्ञानिक, एक ख़ास तौर से तैयार किए गए जहाज़ पोलरस्टर्न द्वारा उत्तरी ध्रुव के सबसे क़रीबी इलाक़े तक पहुँचेंगे। वहां पहुंच कर वे आर्कटिक के मौसम का असर दुनिया पर कैसे पड़ रहा है, इस गुत्थी को सुलझाने की योजना थी। लेकिन इस इरादे में भी जलवायु परिवर्तन ने बाधा डाला।
इस मिशन की कामयाबी इस बात पर निर्भर थी कि, जहाज़ पोलरस्टर्न और इसके साथी एकेडमिक फेडेरोव को आर्कटिक समुद्र में ऐसी जगह टिकाया जाए, जहां पर बर्फ़ की बहुत मोटी सी परत हो। जो इन जहाज़ों का बोझ उठा सके।
जानिए क्या है इस मिशन की विशेषताएं
जैसे कि, इस मिशन के दौरान बहुत महंगे उपकरण जहाज़ से उतार कर प्रयोग के काम में लाए गए। और, जहाज़ ठीक जगह पर एंकर नहीं होता, तो इन उपकरणों के हमेशा के लिए पानी में डूब जाने का डर था। दूसरी वजह ये भी थी कि, जहाज़ स्थिर नहीं होता, तो प्रयोग करना नामुमकिन होता।
मोज़ैक मिशन के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त करें
जिस मिशन पर पोलरस्टर्न और इस पर सवार वैज्ञानिक निकले, उसका नाम मोज़ैक। जो बर्फ़ीले आर्कटिक के मौसम का एक प्रोफ़ाइल तैयार करने का मिशन है। दिक़्क़त यह आड़े आई कि, हर साल आर्कटिक की बर्फ़ की परत पतली होती जा रही है।
इस मिशन की योजना आज से क़रीब दस साल पहले अमरीका की कोलोराडो यूनिवर्सिटी के मैट शूप ने बनाई थी। मैट के अनुसार जिस तेज़ी से आर्कटिक की बर्फ़ पिघल रही है, वैसे में हमारे पास एक या दो साल ही बचे हैं कि हम इतने भारी-भरकम जहाज़ के साथ आर्कटिक में जाकर प्रयोग कर सकें।
पोलरस्टर्न एक आइसब्रेकर जहाज़ है, जो रास्ते की बर्फ़ साफ़ करता चलता है। जैसे ही ये आर्कटिक सर्किल तक पहुंचा, वैज्ञानिकों का सामना बर्फ़ से होने लगा।
इससे पहले भी पोलरस्टर्न इस इलाक़े में आ चुका है। तब इसे बर्फ़ के बीच से रास्ता काटने के लिए एक साथी की ज़रूरत पड़ी थी। तभी रूसी जहाज़ एकेडेमिक फेडेरोव को भी इस मिशन में शामिल किया गया।
जैसे-जैसे ये जहाज़ आर्कटिक के क़रीब पहुंच रहा था, समंदर की लहरें शांत होती जा रही थीं। इनकी जगह बर्फ़ की परत ने ले ली थी। जिसके नीचे समंदर का नीलासमंदर पाया गया था।
ख़तरनाक अभियान
जिन गहरे धब्बों को वैज्ञानिक बर्फ़ की मोटी चादर का संकेत समझ रहे थे, वो बाक़ी जगहों से भी कम बर्फ़ वाली जगह थी। रेक्स वैज्ञानिक के अनुसार आगे का सफ़र बहुत अनिश्चितता भरा रहा। इन में से एक रास्ता तो ऐसा था, जो ग्रीनलैंड के पास जाकर बेहद ख़तरनाक हो जाता है।
पोलरस्टर्न के रास्ते से आगे-आगे जा रहा रूसी जहाज़ एकेडेमिक फेडेरोव ने, उन बर्फ़ीली परतों को तोड़ डाला था, जहां रुकने का ठिकाना मिलने की आशा थी। एकेडेमिक फेडेरोव से मिल रहे आंकड़ों ने कुछ उम्मीद जगाई थी। कई ऐसी बर्फ़ीली चट्टानें समुद्र में मिली थीं, जहां ये जहाज़ अपना खूंटा गाड़ सकता था।

