नवाजुद्दीन सिद्दीकी – अपनी पहचान खुद लिखने वाला एक शख़्स

नवाजुद्दीन सिद्दीकी! एक ऐसा नाम जिसको सुनते ही कई रंग और चरित्र उकेरते हैं हमारे सामने। “गैंग्स ऑफ वासेपुर” , मांझी- द माउंटेन मैन”, “ठाकरे”, “सैक्रेड गेम्स” जैसे सैकड़ों फिल्मों और धारावाहिक में अहम रोले निभाने वाले इस अभिनेता की पहचान अब किसी से छुपी हुई नहीं है। बॉलीवुड के कुछ गिने चुने अभिनेताओं में शुमार हैं नवाज़। जब ये पर्दा पर दिखते हैं तो एक अभिनेता कम एक जीता जागता चरित्र ज्यादा दिखाई देता है।

बॉलीवुड के शीर्ष पर अपना कदम जमाना और एक अलग चमक बिखेरना इतना आसान नहीं रहा है इस अभिनेता के लिए। यहाँ तक पहुचने में इनका भाग्य जैसा कुछ भी नहीं रहा है। ये सख्स अपनी मेहनत के बल पर यहाँ पर विराजमान हुआ है। यह इंसान ने नहीं सिर्फ एक अलग मुकाम कायम किया है बल्कि कई लोगों का प्रेरणास्रोत भी बन गया है। आइये जानते हैं इस सख्स की दर्द भी दास्तां और कर्म की कहानी।

नवाजुद्दीन सिद्दीकी

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के एक बहुत ही छोटे से गांव से हैं नवाजुद्दीन सिद्दीकी। 9 भाई बहन होने से इनकी परवरिश कुछ ख़ास नहीं रही। नवाज़ बताते हैं कि गांव में कुछ ज्यादा करने का था नहीं, खेती ही एक मात्र विकल्प था। और तो और गांव में गुंडागर्दी भी कुछ ज्यादा ही थी। लोग बात बात पर बंदूक निकाल लिया करते थे। इस वजह से नवाज घर छोड़कर शहर में जाकर पढ़ने का विचार बनाया।

नवाजुद्दीन सिद्दीकी की दर्द भरी दास्तां

जैसा की उनके परिवार की आमदनी कुछ ज्यादा नहीं थी इस वजह से उन्हें पढ़ाई के साथ साथ काम भी करना था। इस दौरान उन्होंने छोटी छोटी नौकरियां भी की। इस बीच एक ऐसी घटना घटी थी जिसे बताते बताते नवाज की आंखों में आंसू आ जाते हैं। नवाज को एक खिलौनों की कंपनी में बतौर सुरक्षा गार्ड तैनात किया गया था। जहाँ पर उन्हें 12 घण्टा तक खड़ा होकर पहरा देना होता था। वो अपने काम को बहुत ही अच्छे से भुना रहे थे। एकदिन बहुत धूप थी तो नवाज ने सोचा कि वो 10 मिनट तक एक पेड़ की छांव में खड़े हो जाये। इसी दौरान उनके मालिक ने उनको देख लिया और ततकाल ही उन्हें नौकरी से निकाल दिया और साथ ही पूरे महीने की तनख्वाह भी नहीं दिया।

उसके बाद नवाजुद्दीन ने एक्टिंग सीखने के लिए दिल्ली ने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में गए। अगर आपको मालूम न हो तो आप ये जान ले कि इस स्कूल में दाखिला लेना किसी सीधा पहाड़ पर चढ़ने के बराबर है। इस स्कूल में एडमिशन के लिए पहले से ही आपको अच्छी एक्टिंग आनी चाहिए तब ही आप यहां पर दाखिला लेने के काबिल हो सकते हैं। इस बीच इन्हें यहाँ पर दाखिला मिल गया। इस स्कूल से अनुपन खेर, नसीरुद्दीन शाह और ओमपुरी जैसे कई बड़े कलाकार निकले हैं। नवाजुद्दीन आज से लगभग 24 वर्ष पहले 1996 में स्कूल से बाहर निकलने के बाद काम करना चाहा लेकिन कोई सफलता नहीं मिली।

नवाजुद्दीन सिद्दीकी

उनका फ़िल्मी करियर

लगभग 3 सालों तक ऐसे ही कई छोटी मोटी नौकरियां करने के बाद हताश नवाजुद्दीन सिद्दीकी हार मैन चुके थे और अपना सामान लेकर घर लौटने को सोच ही रहे थे कि इस बीच उन्हे एक फ़िल्म में छोटा से रोल मिल गया। 1999 की फ़िल्म शूल में नवाजुद्दीन को महज 2 सेकंड का रोले मिला था। मगर उस 2 सेकंड के रोल ने उन्हें पर्दे पर पहली बार आने का मौका दिया।

इसके बाद उन्हें बॉलीवुड के फिल्मों में छोटे छोटे रोल मिलने शुरू हो गए। जैसे मुन्ना भाई MBBS में उनका चोर का रोल तो सबको याद होगा। सरफ़रोश फ़िल्म में गुंडा का रोल करने के बाद जूनियर आर्टिस्ट का भी काम किया। जिसमे पैसे के नाम पे न के बराबर मिलता था।

नवाज बताते हैं कि कभी कभी जूनियर आर्टिस्ट के रोल के लिए CREW को रिश्वत देना पड़ता था। लगभग उनका आधा कमाई रिश्वत देने में खत्म हो जाता था।

2004 से 2012 तक इन्होंने कई फिल्में की लेकिन लोग अबतक भी इनको पहचान नहीं पाए थे। ब्लैक फ्राइडे, पीपली लाइव, न्यूयॉर्क जैसे फिल्मों में बहुत गहरेपन से ढूंढने पर उनका चेहरा याद आता है। लेकिन 2012 में आयी फ़िल्म “मांझी” और “Gangs of Wasseypur”  ने इन्हें एक अलग पहचान दिलाई। जो की अब भूलने पर भी नहीं भूलती। उन्हें एक चमकता सितारा बना दिया।

सितारों जैसी चमक

इस फ़िल्म के बाद नवाजुद्दीन सिद्दीकी को साइन करने के लिए निर्देशकों की दौड़ लगनी शुरू हो गयी। इसके बाद अब तो The Lunchbox, Kahani, Talash, Bajrangi Bhaijaan, Raees, Kick और MOM जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों की झड़ी सी लग गयी।

 

नवाजुद्दीन सिद्दीकी

इस मुकाम को हासिल करने के पीछे एक और बहुत बड़ी कहानी दिखती है जो की बहुत लोगों के मुह पे एक जोरदार तमाचा जड़ती है। लोगों का सोचना होता है कि जो लोग देखने में खूबसूरत, हैंडसम और स्मार्ट होते हैं, सिर्फ वो ही बॉलीवुड में अपना नाम बना सकते हैं। लेकिन आपको ये जानने की जरूरत है कि नवाजुद्दीन सिद्दीकी ना तो कद काठी में ज्यादा अच्छे हैं और ना ही देखने में खूबसूरत और हैंडसम हैं और तो और उनकी अंग्रेजी भी अच्छी नहीं हैं। लेकिन इन सबके बावजूद भी अपना एक अलग नाम बनाने में सफलता पायी है। आपको कामयाबी पाने के लिए जरूरी नहीं है कि आप हैंडसम और खूबसूरत दिखो। जरूरी है तो वो है आपका टैलेंट जो की वो आपके भीतर ही है। उसे ढूंढना पड़ेगा और उसको जीना पड़ेगा। बस आप कोशिश करते रहो, एकदिन सब अच्छा होगा।

 

Kumar Parth

Author, Writer, Poet

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