9 जुलाई को कुशल निर्देशक,प्रभावशाली अभिनेता,समर्थ निर्माता,सम्वेदनशील पटकथा लेखक व जीवन को गहराई से समझने वाला व्यक्ति ‘गुरूदत्त’ का जन्म दिवस था। जन्म दिवस था उस व्यक्ति का जिसने हिंदी सिनेमा को मील का पत्थर कही जाने वाली फ़िल्मों से समृद्ध किया। ‘साहब बीबी और गुलाम’,‘प्यासा’ एवं ‘कागज के फूल’ गुरूदत्त की हिंदी सिनेमा को अनुपम भेंट है।
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गुरूदत्त की फिल्में
गुरूदत्त और देवानंद ने अपने सिने भविष्य की शुरुआत साथ साथ की थी। गुरूदत्त की प्रारंभिक फिल्में अपराध वाली थीं। लेकिन जैसे ही उन्हें मौका मिला उन्होने अपने दिल के बहुत करीबी फिल्में ‘प्यासा’ और ‘कागज़ के फूल’ का निर्देशन किया। ‘प्यासा’ व्यावसायिक रूप से भी सफल रही। इस फिल्म में इस मतलबी दुनिया में व्यक्ति के स्थान को दिखाया गया है। निर्देशन और अभिनय के साथ साहिर लुधियानवी के लिखे गीत भी फिल्म को श्रेष्ठता की श्रेणी में पहुँचाते हैं। ‘कागज़ के फूल’ इनके निर्देशन की आखिरी फिल्म थी। फिल्म और इनका जीवन बहुत कुछ मिलते हैं। फिल्म की कहानी और इनके जीवन में कुछ खास अंतर नहीँ है। फिल्म व्यावसायिक घाटे से गुजरी और इसका गहरा प्रभाव गुरूदत्त के हृदय पर पड़ा। इसके बाद इन्होने निर्देशन छोड़ दिया। फिल्म के नायक की भी कुछ ऐसी ही स्थिति बनती है।
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ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या
साहिर लुधियानवी के इस गीत ने ‘प्यासा’ की प्रसिद्धि में महत्व पूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन शायद उन्हें भी ये एहसास रहा ही होगा की “यहाँ एक खिलौना है इन्साँ की हस्ती,ये बस्ती है मुर्दा परस्तों की बस्ती” यही हर व्यक्ति की सच्चाई है और वो भी इससे अलग नहीँ हैं। कुछ दिनों पहले ही कपूर परिवार ने आर .के .फिल्म्स एँड स्टूडियो को बेचने की पुश्टी की थी। ये वही स्टूडियो है जिसने हिंदी सिनेमा को ‘बरसात’,’आवारा’,’श्री 420′ जैसी नायाब फ़िल्मों दी हैं। आज के मॉडर्न स्टूडियो के सामने आज वो भले ही जर्जर और बेकार दिखे लेकिन हिंदी सिनेमा को यह नहीँ भूलना चाहिये की उन्हीं पर चलकर और उन्हीं से प्रेरणा लेकर ही हम आज विश्व भर में प्रतिष्ठा पा रहे हैं। इसीलिए उनकी हिफाज़त हमारी ज़िम्मेदारी है।
उसी तरह महान अभिनेता वा कुशल निर्देशक ‘गुरूदत्त’ के जन्म दिवस पर भी हिंदी सिनेमा का अन्जान बने रहना दुख की बात है।
कुशल निर्देशक,समर्थ पटकथा लेखक,व प्रभाव शाली लेखक थे ‘गुरूदत्त’

