जब कभी देश के अंदर क्रांतिकारियों की, बलिदान की, शहीदों की चर्चा होती है, तब तब भगत सिंह का नाम जरूर जुबान पर आता है. पर उनका ज़िक्र तब और जरूरी हो जाता है जब उस महान क्रांतिकारी का जन्मदिन या शहीद दिवस हो. भगत सिंह ने ब्रिटिश काल के समय भारत की स्थिति पर कई बार चिंता जताई थी, जिसका जकर उनके द्वारा उस समय लिखे गए लेखों और पत्रों में मिलता है. आज शहीद भगत सिंह के जन्मदिन के अवसर पर आज हम उनके कुछ क्रांतिकारी विचारों को याद कर रहे हैं..
भगत सिंह ने ‘इंकलाब जिन्दबाद’ का सही अर्थ बताया था. मॉडर्न रिव्यु के संपादक रामानंद चट्टोपाध्याय को लिखे गए भगत सिंह और बटकेश्वर दत्त के एक पत्र में इंकलाब जिंदाबाद के अर्थ को कुछ इस तरह बताया गया था.
क्या बताया था ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का अर्थ
हम ‘यतींद्रनाथ जिंदाबाद’ का नारा लगाते हैं। इससे हमारा अभिप्राय यह होता है कि उनके जीवन के महान आदर्शों तथा उसका उत्साह को सदा सदा के लिए बनाए रखें जिसने इस महानतम बलिदानी को आदर्श के लिए अकथनीय कष्ट झेलने एवं असीम बलिदान करने की प्रेरणा दी। यह नारा लगाने से हमारी यह लालसा प्रकट होती है कि हम भी अपने आदर्शों के लिए ऐसे ही अचूक उत्साह को अपनाएं और यही वह भावना है जिसकी हम प्रशंसा करते हैं। इसी प्रकार हमें ‘इंकलाब’ शब्द का अर्थ भी कोरे शाब्दिक रूप में नहीं लगाना चाहिए। क्रांति शब्द का अर्थ प्रगति के लिए परिवर्तन की भावना एवं आकांक्षा है। लोग साधारणतया जीवन की परंपरागत दशाओं के साथ चिपक जाते हैं और परिवर्तन के विचार मात्र से ही कांपने लगते हैं।
रूढ़िवादी शक्तियां डालती हैं मानव समाज की प्रगति की दौड़ में बाधा
यही वह अकर्मण्यता की भावना है जिसके स्थान पर क्रांतिकारी भावना जागृत करने की आवश्यकता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अकर्मण्यता का वातावरण निर्मित हो जाता है और रूढ़िवादी शक्तियां मानव समाज को गलत रास्ते पर ले जाती हैं। यही परिस्थितियां मानव समाज की उन्नति में गतिरोध का कारण बन जाती हैं। क्रांति की इस भावना से मनुष्य जाति की आत्मा अस्थाई तौर पर ओत-प्रोत रहनी चाहिए। जिससे रूढ़िवादी शक्तियां मानव समाज की प्रगति की दौड़ में बाधा डालने को संगठित ना हो सके। यह आवश्यक है कि पुरानी व्यवस्था सदैव बदलती रहे और नई व्यवस्था के लिए स्थान व्यक्त करती रहे जिससे कि यह व्यवस्था संसार को बिगड़ने से रोक सके। यह हमारा अभिप्राय है जिसको हृदय में रखकर हम इंकलाब जिंदाबाद का नारा ऊँचा करते हैं.
उस समय के पत्रकारिता के पेशे पर भी उठाया था सवाल
पत्रकारिता का व्यवसाय जो एक समय पर बहुत ऊंचा माना जाता था, आज बहुत गंदा हो गया है। यह लोग एक दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएं भड़क आते हैं और परस्पर सिर फुटव्वौल करवाते हैं। एक दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजना पूर्ण लेख लिखे हैं। ऐसे लेखक जिनका दिलो-दिमाग ऐसे दिनों में शांत रहा हो, बहुत ही कम हैं। अखबारों का असली कर्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, सांप्रदायिक भावनाएं हटाना, परस्पर मेल बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, सांप्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष के वर्तमान आंखों से आंसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि भारत का बनेगा क्या?
इस तरह भगत सिंह ने पत्रकारिता के पेशे पर सवाल उठाते हुए भारत के भविष्य के प्रति चिंता जताई थी.
‘प्यार’ पर क्या थी भगत सिंह की राय
भगत सिंह ने सुखदेव को लिखे एक पत्र में प्यार को पारिभाषित किया था. उन्होंने प्यार का अर्थ बताया था. उन्होंने कहा था-
”जहां तक प्यार के नैतिक स्तर का संबंध है, मैं कह सकता हूं यह अपने में कुछ नहीं है। सिवाय एक आवेग के, लेकिन पाशविक वृत्ति नहीं, एक मानवीय अत्यंत सुंदर भावना। प्यार अपने में कभी भी पाशविक वृत्ति नहीं है, प्यार तो हमेशा मनुष्य के चरित्र को ऊंचा उठाता है। यह कभी भी उसे नीचा नहीं करता और बशर्ते प्यार प्यार हो। तुम कभी भी इन लड़कियों को वैसी पागल नहीं कह सकते जैसे कि फिल्मों में हम प्रेमियों को देखते हैं। वे सदा पाशविक वृत्तियों के हाथों में खेलती हैं। सच्चा प्यार कभी गढ़ा नहीं जा सकता। यह तो अपने ही मार्ग से आता है ,कोई नहीं कह सकता कब। लेकिन यह प्राकृतिक है। हां, मैं यह कह सकता हूं कि एक युवक और युवती आपस में प्यार कर सकते हैं और अपने प्यार के सहारे अपने आवेगों से ऊपर उठ सकते हैं। अपनी पवित्रता बनाए रख सकते हैं।
मनुष्य में प्यार की गहरी से गहरी भावना होनी चाहिए
मैं यहां एक बात साफ कर देना चाहता हूं कि जब मैंने कहा था कि प्यार इंसान की कमजोरी है तो साधारण आदमी के लिए नहीं कहा था, जिस स्तर पर कि आम आदमी होते हैं। एक अत्यंत आदर्श स्थिति होगी, जहां मनुष्य प्यार, घृणा आदि के आवेगों पर विजय पा लेगा, जब मनुष्य अपने कार्यों का आधार आत्मा के निर्देश को बना लेगा लेकिन आधुनिक समय में यह कोई बुराई नहीं है बल्कि मनुष्य के लिए अच्छा और लाभदायक है। मैंने एक व्यक्ति के एक व्यक्ति से प्यार की निंदा की है लेकिन वह भी एक आदर्श स्तर पर। इसके होते हुए भी मनुष्य में प्यार की गहरी से गहरी भावना होनी चाहिए, जिसे कि वह एक ही आदमी में सीमित न कर दे बल्कि विश्वमय रहे।”
इस तरह भगत सिंह ने अपने जीवन में पत्र और लेखों के माध्यम से समाज के विभिन्न पहलुओं पर अपनी रे, अपनी भावनाएं व्यक्त की थीं , जो कई मायनों में आज भी प्रासंगिक हैं.