आईसीसी विश्व कप शुरु हो चुके हैं।आस्ट्रेलिया को 36 रनों से पराजित करने के बाद रविवार को भारत अपने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के साथ खेलेगा। ‘भारत बनाम पाकिस्तान’ सुनते ही दोनों देशों में जोश भर जाता है । और फिर ये तो प्रचलित ही है – “भारत किसी से भी हारे लेकिन पाकिस्तान से नहीँ हारना चाहिये”। वहीं पाकिस्तान भी इस सोच में पीछे नहीँ है।
जब भी भारत पाकिस्तान का क्रिकेट होता है, दोनों देश उतावले हो जाते हैं। जब दोनों देशों की टीम मैदान में उतरती है। तो उसके साथ ही लोगों के मन में पुरानी यादें और रंजिशें उतरती हैं। वहाँ लोग फिर यह भूल जाते हैं की, ये खेल का मैदान है। लोगों को वो मैदान ‘अटारी’ सीमा दिखने लगता है। और दोनों देशों के खिलाड़ी दोनों देशों की रक्षा करते सैनिक।
हम फ़ेसबुक आदि सोशल मीडिया में हज़ारों ऐसे पोस्ट पढ़ते हैं। जहाँ कभी ‘गदर’ जैसे विभाजन पर बनी फ़िल्मों को क्रिकेट मैच से जोड़ दिया जाता है । तो कहीं दोनों देशों के आपसी सम्बन्धों को ऑल आउट और जबर्दस्त शिकस्त से जोड़ दिया जाता है।
1947 में हुए विभाजन के दर्द ने दोनों ही देशों को हिला कर रख दिया था। तब से पनपे इस भेद ने दोनों ही देशों को प्रत्येक स्तर पर प्रभावित किया। लेकिन यह सोचना होगा की, जो भी दोनों देशों के मुद्दे होते हैं, उन्हें खेल के मैदान से जोड़ना कहाँ तक उचित है? ये बहुत ही प्रचलित विचार है की, भारत पकिस्तान के सभी मामलों का जवाब खेल के मैदान में मिलेगा। तभी तो भारत बनाम पाकिस्तान को भारत पाकिस्तान विभाजन के साथ ही जोड़ कर देखा जाता है।
।देश के आपसी रिश्तों को खेल के मैदान में उतारना, दोनों देशों के कप्तानों को नेहरु व जिन्ना तथा मोदी व इमरान खान के रूप में देखना सहज हो सकता है, लेकिन उचित नहीँ
