हमारे हिन्दू धर्म में भगवान् शिव को देवो के देव यानि महादेव कहा जाता है। हालांकि ये बात अलग है कि लोग शिव जी की मूर्ति से ज्यादा उनके शिवलिंग रूप की पूजा करते है। मगर क्या आप जानते है कि आखिर क्यों शिव जी ने शिवलिंग का रूप धरा था। बता दे कि इसके पीछे भी एक बड़ा कारण छिपा हुआ है। जिसके बारे में आज हम आपको बताएंगे। दरअसल एक बार ब्रह्मा जी और भगवान् विष्णु जी के बीच यह विवाद चल रहा था कि उन दोनों में से सबसे ज्यादा श्रेष्ठ कौन है। ऐसे में जब दोनों के बीच विवाद ज्यादा बढ़ गया, तब अग्नि की ज्वाला से लिपटा हुआ एक शिवलिंग ब्रह्मा जी और विष्णु जी के बीच आकर स्थापित हो गया।
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आखिर क्यों शिव जी..
गौरतलब है कि शिवलिंग के बारे में जानने के लिए ब्रह्मा जी ने उस शिवलिंग के ऊपर से और विष्णु जी ने उस शिवलिंग के नीचे से जाना शुरू कर दिया। हालांकि हजारो सालो तक खोज करने के बाद भी उन्हें शिवलिंग के बारे में कुछ पता नहीं चला। बता दे कि काफी खोज करने के बाद ब्रह्मा जी और विष्णु जी दोबारा शिवलिंग के मुख्य स्थान पर पहुँच गए। जहाँ उन्हें वास्तव में ओम का स्वर सुनाई दिया। जी हां इस स्वर को सुनने के बाद दोनों ही इस स्वर की पूजा करने लगे। आपको जान कर हैरानी होगी कि ब्रह्मा जी और विष्णु जी की पूजा से खुश हो कर खुद शिव जी उस शिवलिंग में से बाहर आ गए। यहाँ तक कि उन्होंने दोनों देवो को सद्बुद्धि का वरदान भी दिया।
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मगर दोनों देवो को वरदान देने के बाद शिव जी दोबारा शिवलिंग के अंदर जा कर बस गए। दरअसल शिव जी केवल यह साबित करना चाहते थे कि इस संसार में कोई भी किसी से ज्यादा श्रेष्ठ नहीं होता। असल में हमारी समझदारी तो केवल हमारी बुद्धि पर ही निर्भर करती है। वैसे इसे पढ़ने के बाद तो आपको समझ आ ही गया होगा कि आखिर क्यों शिव जी ने शिवलिंग का रूप लिया था और कैसे उन्होंने ब्रह्मा जी तथा विष्णु जी को अपने स्वर से ज्ञान का सबक सिखाया था।


