हितेश पंत (नई दिल्ली)
बचपन में अपने आंगन वाले घर में आपने गौरैया को चहकते जरूर देखा होगा। मदमस्त धुन में ये गौरैया अपने खाने के जुगाड़ में आंगनों पर आकर दिलखुश शोर-शराबा करती थीं। आंगन वाले घर बनना बंद हुआ और इन गौरैया की चहचहाहट भी कहीं गुम होने लगी। जीवन शैली में बदलाव, आधुनिकीकरण और लगातार बढ़ते निर्माण कार्यों ने इन नन्हीं चिड़ियाओं को हमसे दूर कर दिया। गौरैया की कम होती संख्या से चिंतित होकर हर 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है, पर क्या इनको बचाने के लिए साल का एक दिन काफी है?
इन गौरैया को हमने ही अपने घरों से दूर किया है। शहरों में तो आंगन रहे नहीं, गांवों के आंगन भी अब कंक्रीट में बदलने लगे हैं। बदलती जीनवशैली के बीच हम उस नन्हीं चिड़िया को ही भूल गए, जिसकी चहचहाहट से हमारी सुबह की शुरुआत होती थी। घरों में आंगन बनने तो बंद हुए ही रौशनदान में भी अपना एसी फिट कर लिया। अब ऐसे में कहां से सुनेंगे हम उसकी आवाज।
बीते वर्ष आंध्र प्रदेश विश्वविद्यालय में हुए अध्ययन के मुताबिक देश में गौरैया की संख्या में करीब 60 फीसदी की कमी हुई है। यह कमी गांवों के साथ शहरों में भी है। कई अध्ययन तो ये बताते हैं कि गौरैया की आबादी घट कर अब खतरनाक स्तर पर है। इनकी घटती संख्या की वजह भी हम ही हैं। खेतों में कीटनाशकों का प्रयोग इतना बढ़ गया है कि चिड़िया अपना खाना तक नहीं जुटा पाती। चिड़िया को दाना देना तो दूर अब छतों में लोग अनाज तक नहीं सूखाते।
मोबाइल टावर के रेडिएशन, बिजली के खुले तार और हमारी नई तकनीक भी गौरेया को हमसे दूर कर रही है। साल के 365 दिन हम अपनी जरूरतें पूरी करने में व्यस्त रहते हैं और एक दिन याद आती इस नन्हीं चिड़िया की। इस दिन भी लिखने-पढ़ने वाले लोग थोड़ा याद कर लेते हैं इन्हें। बाकी किसी को क्या फर्क पड़ता है।
गौरैया के अंग्रेजी शब्द स्पैरो का मतलब होता है प्यार। इस चिड़िया ने अपने नाम के अनुरूप तो पूरा प्यार दिया, लेकिन हमने उसे अपने प्यार से महरूफ रखा। न उनके खाने पीऩे के बारे में सोचा, न उनके ठौर-ठिकाने के बारे में। गंदगी से बचने के लिए उसके बनाए घोंसले को भी उखाड़ फेंका। क्या फर्क पड़ता है गौरैया रहे न रहे। उसकी आवाज ही सुननी होगी तो इंटरनेट पर सुन लेंगे। है ना। जनाब कभी अपने बच्चों या परिवार के साथ गौरैया को बुलाने की कोशिश कीजिए। आपके घर के पास दाना-पानी खाते-पीते जब ये चहचहाएगी जो यकीन मानिए, मन को वो सुकून मिलेगी जिसकी आपको तलाश थी। अंत में आपसे यही गुजारिश है कि हो सके तो अपने घरों पर इनके घोंसले और खाने-पीने का कुछ इंतजाम कीजिएगा, लेकिन साल में सिर्फ एक दिन नहीं।



