हितेश पंत (नई दिल्ली)
शरीर में नौ गोलियां लगने के बाद भी वो सीमा पर दुश्मनों के छक्के छुड़ाता रहा। वो खाकी वर्दी को अपनी दूसरी त्वचा बताता है। पूरी तरह फिट न होने के बावजूद वो सीमा पर अपनी तैनाती चाहता है। ये जांबाज कोई और नहीं बल्कि सीआरपीएफ कमांडेंट चेतन चीता हैं। गंभीर गोलीबारी में घायल होने के बाद चेतन चीता करीब डेढ़ महीने कोमा में रहे और अब वे ड्यूटी पर वापस लौट आए हैं।
कश्मीर के बांदीपोरा सेक्टर में बीते साल 14 फरवरी को भारतीय जवानों और आतंकियों के बीच भीषण मुतभेड़ हुई। इस मुतभेड़ में चेतन चीता के शरीर में नौ गोलियां लगी, बावजूद इसके वो जंग के मौर्चे पर डटे रहे। गोलियों से छलनी चेतन चीता आतंकियों को मुंहतोड़ जबाव दे रहे थे। चेतन चीता के मजबूत इरादों के आगे आतंकियों को मुंह की खानी पड़ी।
इस मुतभेड़ में चेतन चीता गंभीर रूप से घायल हो गए। गोलीबारी में उनके दिमाग, दांयी आंख, पेट, बाहें और बांए हाथ पर गोलियां लगी। डेढ़ महीने तक वो कोमा में रहे। इस मुतभेड़ में चेतन चीता अपनी एक आंख गवां चुके हैं। हाथों में अभी संवेदना नहीं है। शरीर में कई जगह मांस कटे होने के निशान हैं। ऐसी स्थिति के बाद भी चेतन चीता का सही होकर ड्यूटी ज्वाइन करना किसी चमत्कार से कम नहीं है।
युवाओं को प्रेरित करते हुए चेतन कहते हैं कि युवाओं का अपना 100 प्रतिशत देश को देना चाहिए। मैं भी गोली लगने के बाद मैदान से हट सकता था। लेकिन देश के लिए मैंने गोलियों का सामना किया। वे कहते हैं कि सभी लोग मेरी ज्वाइनिंग से चिंतित हैं। लेकिन मैं जानता हूं कि जितनी जल्दी में अपना काम शुरू करूंगा, उतनी ही जल्दी फिट होऊंगा। देश सेवा का उनका ये जज्बा युवाओं के लिए प्रेरणा है।
अपनी जान दांव पर लगाकर आतंकियों को छक्के छुड़ाने वाले चेतन चीता को पिछले साल 15 अगस्त पर दूसरे सबसे बड़े गैलेंट्री अवॉर्ड कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया। उन्होंने सीआरपीएफ मुख्यालय में ज्वाइनिंग ली है। अधिकारियों का कहना है कि चेतन अभी पूरी तरह फिट नहीं हैं, ऐसे में उन्हें सीमा पर तैनात नहीं किया जा सकता। फिलहाल वे मुख्यालय में ही कामकाज देखेंगे।
