सड़कें बनें बच्चों के लिए सुरक्षित: MANUU और यूनिसेफ ने हैदराबाद में आयोजित किया राष्ट्रीय मीडिया परामर्श

MANUU और यूनिसेफ

हैदराबाद, 22 मई 2025: बच्चों और युवाओं के लिए सड़कों को सुरक्षित बनाने की दिशा में सरकार, शिक्षक, समुदाय और मीडिया के बीच मज़बूत साझेदारी अत्यंत ही ज़रूरी है। यही संदेश आज हैदराबाद में आयोजित राष्ट्रीय मीडिया परामर्श में उभर कर सामने आया, जिसका आयोजन यूनिसेफ इंडिया और मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी (MANUU) के जनसंचार और पत्रकारिता विभाग ने संयुक्त रूप से किया।

इस दिनभर की चर्चा का उद्देश्य था सड़क सुरक्षा को बच्चों के अधिकार, जनस्वास्थ्य और विकास के मुद्दे के रूप में दोबारा स्थापित करना, और साथ ही यह समझना कि मीडिया कैसे व्यवहार में बदलाव, कानूनों के बेहतर पालन और सिस्टम सुधार में अपनी भूमिका और मज़बूत कर सकता है।

स्कूल ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन के डीन प्रो. मोहम्मद फरियाद ने यूनिसेफ के प्रतिनिधियों और हैदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई, कोच्चि समेत कई शहरों से आए रेडियो जाकीज़ और पत्रकारों का गर्मजोशी से स्वागत किया। उन्होंने कहा, “मीडिया जन-जागरूकता और व्यवहार परिवर्तन का सशक्त माध्यम है। सामुदायिक रेडियो और युवाओं के नेतृत्व वाले अभियानों के ज़रिए हम बच्चों और किशोरों के बीच ज़िम्मेदार सड़क व्यवहार को बढ़ावा दे सकते हैं।”

यूनिसेफ इंडिया की कम्युनिकेशन, एडवोकेसी और पार्टनरशिप चीफ सुश्री ज़ाफरीन चौधरी ने कहा, “बच्चों की सड़क सुरक्षा सिर्फ कानून और सड़क निर्माण का विषय नहीं है, बल्कि यह एक साझा सामाजिक ज़िम्मेदारी है। सुरक्षित स्कूल ज़ोन, मजबूत आपातकालीन सेवाएं और जन-जागरूकता अभियानों की अहम भूमिका है। मीडिया के पास आंकड़ों को भावनात्मक कहानियों में बदलने की ताकत है—ऐसी कहानियाँ जो समाज को सोचने और कदम उठाने के लिए प्रेरित करती हैं।”

इस परामर्श में 100 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया, जिनमें MANUU के शिक्षक और विद्यार्थी, करीब 50 रेडियो जॉकी, प्रिंट और टीवी मीडिया के पत्रकार, सरकारी अधिकारी, सिविल सोसाइटी प्रतिनिधि और युवा कार्यकर्ता शामिल थे।

यह आयोजन ऐसे समय में हुआ जब भारत में बच्चों की सड़क दुर्घटनाओं में मौतों की संख्या बढ़ती जा रही है। सिर्फ 2022 में ही 18 वर्ष से कम आयु के 16,443 बच्चों और किशोरों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में हुई—जो 5–19 आयु वर्ग में मृत्यु का सबसे बड़ा कारण बन गया। इनमें ज़्यादातर पैदल यात्री, साइकिल चालक और दोपहिया वाहन सवार थे—कई ने हेलमेट तक नहीं पहना था। इसके बावजूद, मीडिया कवरेज अक्सर बड़ी या हाई-प्रोफाइल घटनाओं तक ही सीमित रहती है, जिससे कई त्रासदियां और व्यवस्थागत खामियां अनदेखी रह जाती हैं।

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई), हैदराबाद क्षेत्र के मुख्य महाप्रबंधक श्री पी. शिव शंकर ने कहा, “हम सभी सड़क का उपयोग करने वालों, विशेषकर पैदल यात्रियों, साइकिल सवारों और दोपहिया चालकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इसके लिए शिक्षा, प्रवर्तन, प्रमाण और इंजीनियरिंग—इन चारों को एक साथ जोड़कर काम करना जरूरी है।”

MANUU के कुलपति प्रो. सैयद ऐनुल हसन ने कहा, “यह परामर्श केवल एक कार्यशाला नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का आह्वान है। हम अपने विद्यार्थियों को ऐसी पत्रकारिता के लिए तैयार कर रहे हैं जो ज़िम्मेदारी और गहराई से समाज को दिशा दे। सड़क सुरक्षा ऐसा मुद्दा है जो बुनियादी ढांचे, समानता और न्याय से गहराई से जुड़ा है।”

इसादक (आईसाडक) – अबर्टिस कंपनी के सीईओ श्री रेमन चेसा ने कहा, “हर सड़क सुरक्षा रणनीति के केंद्र में बच्चों को होना चाहिए—चाहे वह स्कूल ज़ोन में गति सीमा हो या हेलमेट कानून। विश्वविद्यालयों, मीडिया और यूनिसेफ जैसी वैश्विक संस्थाओं के साथ साझेदारी इसलिए ज़रूरी है।”

यूनिसेफ हैदराबाद फील्ड ऑफिस के प्रमुख डॉ. जेलालेम ताफेसे ने कहा, “राष्ट्रीय और राज्य सरकारों, नगर निकायों, स्कूलों, राजमार्ग प्राधिकरणों, स्वास्थ्य विभागों, अस्पतालों, रेडियो जॉकी, प्रिंट और टीवी मीडिया—इन सभी को मिलकर सड़क सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। ट्रॉमा रिस्पॉन्स में देरी एक बड़ी चुनौती है—कई बच्चे घटनास्थल पर ही दम तोड़ देते हैं। हमें बाल चिकित्सा आपातकालीन सेवाएं, प्रशिक्षित टीमें और समुदाय स्तर पर जागरूकता फैलानी होगी।”

यूनिसेफ इंडिया के स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. सैयद हुब्बे अली ने कहा, “सड़क दुर्घटनाएं सिर्फ ट्रैफिक का मामला नहीं, बल्कि एक भारी लेकिन कम पहचाना गया स्वास्थ्य बोझ हैं। हमें ट्रॉमा देखभाल सिस्टम को मज़बूत करना होगा, समुदायों को फर्स्ट रिस्पॉन्डर बनाने के लिए प्रशिक्षित करना होगा, और बच्चों की सुरक्षा को हर मोबिलिटी प्लानिंग का हिस्सा बनाना होगा।”

उन्होंने यह भी बताया कि अप्रैल 2025 में भारत में आयोजित वर्ल्ड हेल्थ समिट में सड़क परिवहन और स्वास्थ्य मंत्रालय ने बच्चों और किशोरों पर केंद्रित रोड सेफ्टी रोडमैप जारी किया।

एक हाई-लेवल पैनल चर्चा इस कार्यशाला की मुख्य विशेषता रही, जिसका विषय था: “बच्चों और युवाओं की सड़क सुरक्षा में मीडिया की भूमिका”। इसका संचालन वरिष्ठ पत्रकार श्रीनजॉय चौधरी ने किया।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सहयोगी केंद्र, बेंगलुरु के प्रमुख डॉ. जी. गुरुराज ने कहा, “सड़क हादसे कोई इत्तेफाक नहीं होते—ये सिस्टम की विफलताओं का नतीजा होते हैं। हमारे पास आंकड़े और कानून मौजूद हैं, लेकिन सतत जन-विमर्श और जन दबाव की कमी है। मीडिया की भूमिका यहीं सबसे अहम हो जाती है—सही कहानियाँ, गलत नतीजों को रोक सकती हैं।”

अन्य वक्ताओं में शामिल थे डॉ. श्रीधर र्यावंकी, स्वास्थ्य विशेषज्ञ, यूनिसेफ हैदराबाद फील्ड ऑफिस, सुश्री रचना शर्मा, प्रिंसिपल, सिल्वर ओक्स इंटरनेशनल स्कूल और युवा कार्यकर्ता श्याम शुक्ला, जिन्होंने युवाओं में हेलमेट उपयोग की जरूरत पर ज़ोर दिया।

रेडियो जॉकी प्रतिभागियों ने यूनिसेफ की सोनिया सरकार और प्रोसुन सेन और MANUU शिक्षकों के साथ मिलकर जिंगल्स, टॉक शो और इंटरएक्टिव सेगमेंट तैयार किए। उनकी प्रस्तुति हेलमेट उपयोग, स्कूल आवागमन की सुरक्षा, किशोर वाहन चालन और बायस्टैंडर प्रतिक्रिया जैसे विषयों पर केंद्रित थी।

कार्यक्रम का समापन एक सामूहिक आह्वान के साथ हुआ, जिसमें मीडिया, विश्वविद्यालयों और नीति-निर्माताओं से अपील की गई कि वे सड़क सुरक्षा को सिर्फ ट्रैफिक का मुद्दा नहीं, बल्कि विकास की प्राथमिकता के रूप में लें। प्रतिभागियों ने ज़ोर दिया कि खासकर वंचित समुदायों में बच्चों की सुरक्षा की कहानियों को प्रमुखता से उठाया जाए और सामुदायिक संचार और संवाद के ज़रिए लोगों के व्यवहार में परिवर्तन लाया जाए।

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