सारागढ़ी की लड़ाई पर आधारित फिल्म केसरी ने ये साबित कर दिया है की ज़रूरी नहीं है की एक शानदार कहानी एक शानदार फिल्म को जन्म दे| फिल्म केसरी देखने के बाद अधिकतर लोगों का यही मत है की इस के निर्माता एक लाजवाब इतिहास के टुकड़े को पा कर निश्चिंत हो गए और इसीलिए फिल्म का कार्यान्वयन काफी सुस्त ढंग से किया गया है|
कमज़ोर लेखन की मार सेहती एक लाजवाब कहानी
सारागढ़ी की लड़ाई इतिहास के पन्नो में खो नहीं गयी है| २१ सिखों की बहादुरी काफी अच्छी तरह से प्रलेखित है| ये अपने आप में फिल्म केसरी को एक बहुत अच्छा ढांचा प्रदान करता है| इस ढांचे को लेकर एक बहुत ही अच्छा स्क्रीनप्ले तथा स्क्रिप्ट लिखी जा सकती थी| भिन्न प्रकार के किरदार और उनकी कहानियो को बून कर एक अभूतपूर्व फिल्म बनायीं जा सकती थी| दुःख की बात ये है की फिल्म केसरी के लेखकों ने कहानी की ये क्षमता नष्ट कर दी|
माने न माने भारत में ये दौर चल रहा है राष्ट्रवादी फिल्मों का| ये राष्ट्रवादी फ़िल्में न केवल बड़ी मात्रा में बन रही हैं अपितु पसंद भी की जा रही हैं| फिल्म केसरी भी इसी श्रेड़ी में आती है परन्तु इतना सक्षम प्रकरण होने के बावजूद अधिकतर समय के लिए देखने वाले के मन में कोई भी भाव जगाने में असमर्थ होती है|
२१ सिखों के नायब बहादुरी की ये कहानी इतनी बुरी तरह से लिखी गयी है की मन में भाव जगाना तो दूर की बात है ये काफी समय तक दिलचस्पी भी नहीं जगा पाती है| हँसाने के कुछ प्रयास जो अधिकतर नाकामयाब होते हैं इसे और बुरा बनाते हैं|
फिल्म केसरी को बचाने वाले लेखन के पहलु
जाती व्यवस्था पर आधारित कुछ लाइन हैं जो फिल्म को थोड़ी गहराई प्रदान करती है| फिल्म केसरी को ऐसी और गहराई की ज़रुरत थी चाहे वह सामाजिक मुद्दों के तौर पर आती या फिर किरदारों की कहानियो के तौर पर|
एक काम जो निर्माताओं ने बहुत अच्छा किया है वह है फिल्म के अच्छे और बुरे लोगों के चरित्र का विरोधाभास प्रकट करना| हमारे वीर सिख सेवा के तहत मस्जिद भी बनाते हैं जबकि अफगानी लुटेरे बेबस स्त्रियों की गर्दन काटते हुए और शहीदों के शरीर को लूटते हुए दिखाए जाते है|
ऐसा प्रतीत होता है की लेखकों ने अपनी साड़ी ऊर्जा चरमोत्कर्ष या “क्लाइमेक्स” के लिए बचा रखा था| क्लाइमेक्स वाकई में काफी अच्छा था| यहाँ पर जाकर अंततः देखने वाले में एक जोश और गर्व की भावना जागती है| युद्ध के दृश्य आपके अंदर का राष्ट्रवाद जगाते हैं और फिल्म केसरी उन वीरों को श्रद्धांजलि देने का अपना मकसद पूरा करती हुई प्रतीत होती है|
अक्षय कुमार का वन मैन शो: अच्छा या बुरा?
जहाँ तक रही बात अभिनय की तो अक्षय कुमार अपने भरपूर अनुभव का फायदा उठाते दिखे| उन्हें पता था कब कैसे क्या करना है| लेकिन ये कहानी केवल एक इंसान की नहीं थी| ख़राब लेखन तथा डायरेक्शन के चलते बाकी किरदार कही खो गए और संतोषजनक अभिनय के बावजूद अपनी छाप नहीं छोड़ पाए|
फिल्म केसरी की सबसे अच्छी बातें
फिल्म केसरी में दिखाए गए स्थान चाहे वो CGI निर्मित हो या फिर असली वाकई लाजवाब थे और फिल्म को एक खगोलीय सुंदरता प्रदान कर रहे थे| किरदारों की वेश भूषा न केवल ऐतिहासिक तौर पर सही थी बल्कि काफी अच्छे से तामील की गयी थी|
निष्कर्ष
फिल्म केसरी एक अत्यंत अच्छी फिल्म हो सकती थी| जिस कहानी पर वह आधारित है वो अपने आप में अभूतपूर्व है| किन्तु लेखक तथा डायरेक्टर इसी कहानी के भरोसे बैठ गए और ये मूवी उन २१ वीर सिखों के ठीक विपरीत इतिहास पे अपनी छाप छोड़ने में असमर्थ रही|
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