गुलाबो सिताबो रिव्यू: अमिताभ बच्चन और आयुष्मान खुराना लाए हैं वो फिल्म जो अभी हम सबको चाहिए थी!

गुलाबो सिताबो

कोरोना वायरस के दौर में हमें अपने घरों में रोकने के लिए दो बेहतरीन कलाकार लाए हैं एक खट्टी मीठी कहानी। सदी के महानायक, अमिताभ बच्चन और लीग से हटकर फिल्में करने के लिए जाने जाने वाले आयुष्मान खुराना साथ आए हैं एक कहानी लेकर।

गुलाबो सिताबो

गुलाबो सिताबो कहानी है एक हवेली, फातिमा महल की, जिसका कि नाम रखा गया फातिमा बेगम(फर्रूख जफ्फर), जो कि हवेली की मालकिन और मिर्जा चुन्नन नवाब(अमिताभ बच्चन) की बेगम हैं। मिर्जा अपने फातिमा महल से इतना प्यार करते हैं कि वो अपनी बेगम के मरने का इंतेजार करते हैं ताकि वो हवेली उनकी हो जाए। मिर्जा एक कंजूस, लालची और खूसट बुड्ढा आदमी है। फिल्म शुरू होती है एक सीन से जहां मिर्जा एक लाइट बल्ब चुराते और बेचते हुए दिखता है। मिर्जा को फिल्म मे कई जगह ऐसा दिखाया गया है और ये फिल्म में हास्य पैदा करता है। इसके बाद आता हैं बांके(आयुष्मान खुराना) का किरदार जो कि मिर्जा के फातिमा महल में एक किरायेदार है, और लालच में मिर्जा से पीछे नहीं है। बांके, हवेली में ‘दीमक’ की तरह रहता है और किराया भी नहीं देता। एक दिन बांके हवेली कि एक दीवार गिरा देता है, तब मिर्जा उसे अपनी हवेली से निकालने के लिए कानून का सहारा लेने का सोचता है और मिलता है क्रिस्टोफर क्लार्क(बृजेन्द्र काला) से। दूसरी तरफ बांके, ASI ऑफिसर ज्ञानेश(विजय राज) से हाथ मिलता हैं जो कि हवेली को हेरिटिज साइट घोषित करवाना चाहता है और सभी किराएदारों को कम से कम LIG अपार्टमेंट दिलवाने का वादा करता है। यही से शुरू होता है मिर्जा और बांके के बीच घमासान और शुरू होती है लालच की एक कहानी। हवेली के साथ आखिर में क्या होता है ये फिल्म के दूसरे हाफ में देखने मिलेगा। 

अमिताभ बच्चन, हमेशा की तरह, स्क्रीन पर अद्भुत हैं। महानायक ने मिर्जा के किरदार को बखूबी स्क्रीन पर उतारा है। मिर्जा के किरदार का हर पहलू, चाहे वो उसका लालच हो, चाहे हवेली के लिए प्यार, चाहे मिर्जा का खूसटपना, अमिताभ बच्चन ने खूबसूरती से निभाया है। इसे एक क्लासिक अमिताभ इक्स्पीरीअन्स कह सकते हैं।

आयुष्मान खुराना ने बांके को परदे पर बखूबी उकेरा है। आयुष्मान, बांके के किरदार में जान डाल देते हैं। हर सीन में आयुष्मान ने पैसा वसूल काम किया है।

फिल्म की सपोर्टिंग कास्ट, चाहे वो बृजेन्द्र काला हों, विजय राज, सृष्टि श्रीवास्तव, या अनन्या द्विवेदी सभी ने अपने किरदारों को बेहद उम्दा तरीके से निभाया है। कोई भी किरदार प्लॉट से बाहर नहीं लटकता और ये किरदार कहानी में चार चाँद लगा देते हैं। हालांकि फातिमा बेगम और मिर्जा के साथ में कुछ और सीन्स होते तो मज़ा आता।

राइटर-डायरेक्टर जोड़ी जूही चतुर्वेदी और शुजीत सरकार ने शानदार काम किया है। फिल्म अपने प्लॉट पर शुरू से आखिर तक बड़े खूबसूरती से चलती है। फिल्म का पहला हाफ, जिसमें सभी किरदारों को स्थापित किया जा रहा है वो जरूर आपको थोड़ा बोर कर सकता है। लेकिन कहानी अपने दूसरे हाफ में रफ्तार पकड़ती है और पहले हाफ कि बोरियत को कम करते हुए आगे बढ़ती है। फिल्म में कुछ बेहतरीन सीन आपको देखने मिलेंगे।

अविक मुकोपाध्याय ने कैमरा का बहुत अच्छा काम किया है।

शांतनु मोइत्रा, जहां बहुत अच्छा बैकग्राउंड म्यूजिक देते हैं वहीं फिल्म के गाने इतने कोई खास नहीं हैं।

सब देखते हुए कहा जा सकता है कि गुलाबो सिताबो एक अच्छी फिल्म है। फिल्म एक व्यंग्य है लोगों की निजी और पेशे से जुड़े लालच पर। यह ऑनलाइन रिलीज होने वाली पहली बॉलीवुड फिल्म है तो अगर आपके पास amazon prime video का सब्स्क्रिप्शन है तो देखिए फिल्म को, बढ़िया समय कटेगा(और करने को है भी क्या)।

मेरी तरफ से फिल्म को 3 स्टार्स। 

Swapnil Vijay Tiwari

Motion Graphics Designer by Profession. A Poet and Writer by Passion.

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